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मद्रास हाईकोर्ट ने पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल की बहाली का निर्देश दिया

LiveLaw News Network
18 April 2022 5:45 AM GMT
मद्रास हाईकोर्ट ने पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल की बहाली का निर्देश दिया
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मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) द्वारा निर्धारित नियम सभी यूनिवर्सिटी/इंस्टीट्यूट के लिए बाध्यकारी हैं। कोई भी यूनिवर्सिटी/इंस्टीट्यूट अपने दम पर नियम निर्धारित नहीं कर सकते हैं।

जस्टिस वी पार्थिबन की पीठ यूनिवर्सिटी द्वारा पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य और प्रोफेसर डॉ. एस कोठंदरमन और डॉ. ए.वी रविप्रकाश द्वारा उनकी बलपूर्वक सेवानिवृत्ति के खिलाफ दायर दो रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। यूनिवर्सिटी ने एआईसीटीई द्वारा निर्धारित 65 वर्ष की आयु के मुकाबले सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष निर्धारित की है।

पृष्ठभूमि

दोनों रिटों में याचिकाकर्ता पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य और प्रोफेसर हैं। पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना वर्ष 1984 में हुई थी। यह एक स्वायत्त तकनीकी संस्थान है, जो पूरी तरह से सरकार द्वारा वित्त पोषित है और एआईसीटीई नियमों द्वारा शासित है। हालांकि, 2019 में पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी एक्ट, 2019 को एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी के रूप में पुडुचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज के पुनर्गठन के लिए पेश किया गया था। यह अधिनियम 05.09.2020 को प्रभावी हुआ।

शिक्षण स्टाफ की सेवा शर्तों को एआईसीटीई द्वारा नियंत्रित किया जाता है। नवीनतम एआईसीटीई विनियम अर्थात् वेतनमान पर एआईसीटीई विनियम, सेवा की शर्तें और शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यताएं जैसे लाइब्रेरी, फिजिकल एजुकेशन, शिक्षण संस्थान और प्रशिक्षण संस्थान (डिग्री) विनियमन, 2019" दिनांक 01.03.2019 ने कुछ शर्तों को पूरा करने पर सभी संकाय सदस्यों और संस्थानों के प्राचार्यों / निदेशकों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष और यहां तक ​​कि 70 वर्ष तक की आयु निर्धारित की।

इन विनियमों के बावजूद, याचिकाकर्ताओं को 62 वर्ष की आयु पूरी करने पर बलपूर्वक सेवानिवृत्त कर दिया गया। इस समयपूर्व सेवानिवृत्ति से व्यथित वर्तमान रिट याचिकाएं यूनिवर्सिटी को निर्देश देने के लिए दायर की गई हैं कि वे एआईसीटीई नियमों के अनुसार सेवानिवृत्ति की आयु होने तक अपनी सेवाएं जारी रखें।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2019 अधिनियम में बचत खंड के अनुसार, जो कुछ भी टेक्निकल यूनिवर्सिटी एक्ट, 2019 के लागू होने से पहले 05.09.2020 तक लागू है, वही जारी रहेगा। इन्हीं नियमों के तहत टीचिंग स्टाफ शासित होगा। उनके अनुसार, यूनिवर्सिटी एआईसीटीई नियमों पर विचार किए बिना अपनी सेवानिवृत्ति की आयु तय नहीं कर सकता है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि विनियम एक केंद्रीय अधिनियम के तहत जारी किए गए है, जैसे कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अधिनियम और प्रायवेट यूनिवर्सिटी/इंस्टीट्यूट उसी का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि जब नियम सभी टेक्निकल इंस्टीट्यूट पर लागू हो गए हैं तो प्रायवेट यूनिवर्सिटी/इंस्टीट्यूट की सुविधा के आधार पर इन नियमों को "अपनाने" का कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने तमिलनाडु राज्य और अन्य बनाम अधियामन एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी भरोसा किया। इस मामले में अदालत ने माना था कि जब दो कानूनों के बीच संघर्ष होता है तो केंद्रीय कानून प्रतिकूलता की सीमा तक प्रबल होगा।

वकील ने तब डॉ. जोगेंद्र पाल सिंह और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (2021) में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले और डॉ. जी.आर. भारत साई कुमार बनाम कर्नाटक राज्य (2021) में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा किया। यहां अदालतों ने एआईसीटीई नियमों की प्रयोज्यता की अनिवार्य प्रकृति की पुष्टि की।

प्रतिवादी के वकील ने प्रस्तुत किया कि उपरोक्त विनियमन केवल तभी लागू होता है जब यूनिवर्सिटी/इंस्टीट्यूट पूरी एआईसीटीई योजना/विनियम का अनुपालन कर रहा हो। यूनिवर्सिटी ने सातवीं सीपीसी के कार्यान्वयन के अनुसरण में वेतनमानों के संशोधन के कारण अपने कर्मचारियों को भुगतान किए जाने वाले वेतन के बकाया के संबंध में केंद्र सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं लेने का निर्णय लिया।

उसने 01.08.2019 से केवल इसके भुगतान को प्रतिबंधित किया था। एआईसीटीई विनियमों के खंड 2.11 के अनुसार 01.01.2016 से अपने कर्मचारियों को भुगतान के संशोधन के बकाया के भुगतान के लिए केंद्रीय सहायता प्राप्त करने की अनुपस्थिति में सेवानिवृत्ति की आयु के निर्धारण के संदर्भ में स्वत: प्रयोज्यता पर कोई जोर नहीं दिया जा सकता है।

एआईसीटीई की ओर से कहा गया कि यह सही है कि सभी तकनीकी संस्थान एआईसीटीई के दिनांक 01.03.2019 के नियमों के तहत शासित होते हैं, जिसमें सेवानिवृत्ति की आयु का निर्धारण भी शामिल है। बॉम्बे हाईकोर्ट के ललित राजेंद्र गजानन बनाम विद्यावर्धनी, इसके सचिव (2021) के फैसले में भरोसा किया गया, जिसमें सेवानिवृत्ति की उम्र ही सवालों के घेरे में थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना था कि एआईसीटीई द्वारा तय की गई सेवानिवृत्ति की उम्र राज्य के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा तय की गई उम्र से अधिक होगी।

इसमें शामिल सभी पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि यूनिवर्सिटी संवैधानिक योजना और विभिन्न मामले कानूनों से बेखबर है, जो सूचित करते रहे हैं कि एआईसीटीई के नियम प्रकृति में अनिवार्य हैं। यूनिवर्सिटी द्वारा अधिवर्षिता की आयु के निर्धारण के संबंध में अपने कानूनी दायित्व से बाहर निकलने के लिए विनियम 2.11 की विकृत व्याख्या को सर्वथा कष्टप्रद होने के रूप में छूट दी जानी चाहिए।

इसके अलावा, अदालत ने माना कि नियम 2.12 के तहत निर्धारित सेवानिवृत्ति की उम्र तीसरे प्रतिवादी यूनिवर्सिटी पर बाध्यकारी है और एआईसीटीई विनियमन के प्रतिकूल सेवानिवृत्ति की आयु के किसी भी अन्य नुस्खे को शून्य और निष्क्रिय माना जाना चाहिए और इसे लागू नहीं किया जा सकता है।

कार्तिक राजन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए। उत्तरदाताओं एक और चार के लिए एन माला और प्रतिवादी नंबर पांच (एआईसीटीई) के लिए एएल गणथीमति उपस्थित हुईं।

केस शीर्षक: डॉ. एस. कोठंदरमन बनाम प्रो-चांसलर और संबंधित मामला

केस नंबर: 2021 का डब्ल्यू.पी नंबर 17918

साइटेशन: 2022 लाइव (Mad) लॉ 164

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