Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

बरी करने की अपील | यदि निचली अदालत का तर्क उचित है तो अपीलीय कोर्ट को नये तर्क नहीं देने चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
5 Aug 2022 5:40 AM GMT
बरी करने की अपील | यदि निचली अदालत का तर्क उचित है तो अपीलीय कोर्ट को नये तर्क नहीं देने चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट
x

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बरी किये जाने से संबंधित अपीलों में, अपीलीय कोर्ट को निर्णय को फिर से लिखने या नए तर्क देने की आवश्यकता नहीं है, यदि नीचे की अदालत द्वारा बताए गए कारण उचित और माकूल पाए जाते हैं।

जस्टिस डॉ कौशल जयेंद्र ठाकर और जस्टिस अजय त्यागी की पीठ ने आगे कहा कि भले ही रिकॉर्ड पर साक्ष्य के आधार पर दो तार्किक विचार/निष्कर्ष संभव हों, लेकिन अपीलीय शक्तियों का इस्तेमाल करते वक्त अपीलीय कोर्ट को बरी करने के संबंध में ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज निष्कर्ष को छेड़ना नहीं करना चाहिए।

संक्षेप में मामला

कोर्ट एक हत्या के मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष), बागपत द्वारा पारित फैसले और आदेश के खिलाफ एक सरकारी अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी जगत सिंह, रमेश और सुरेश उर्फ लाला को आईपीसी की धारा 307, 504 के तहत और सुरेश उर्फ लाला को आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 25 के तहत अपराध के लिए भी बरी कर दिया गया था।

उपरोक्त अपील के साथ, कोर्ट उसी हत्या मामले के संबंध में अपीलकर्ता-लखन उर्फ बबलू द्वारा की गई पहली अपील पर भी सुनवाई कर रहा था, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष), बागपत ने उसे आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया था और सजा सुनाई थी।

आरोपों के मुताबिक आरोपी लखन उर्फ बबलू (आईपीसी 302 के तहत दोषी), जगत सिंह (बरी) और सुरेश (बरी) ने देसी पिस्तौल अपने हाथों में पकड़कर मृतक (रजनीश) और उसके रिश्तेदारों को गालियां देना शुरू कर दिया था।

इसके बाद, जगत सिंह, सुरेश और रमेश ने रजनीश (मृतक) को अपनी बाहों में पकड़ लिया और लखन उर्फ बबलू ने रजनीश (मृतक) पर नजदीक से गोली चला दी। दरअसल उसने तमंचा की बैरल को बाईं बांह के ऊपर के हिस्से में रखकर गोली चला दी थी। रजनीश जमीन पर गिर गया था और उसकी मौत हो गई।

रखी गईं दलीलें

बरी किए गए अभियुक्तों के संबंध में, अभियुक्त-प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि उन्हें ट्रायल कोर्ट ने सही ही बरी किया था, क्योंकि उनकी मौके पर उपस्थिति संदिग्ध थी।

यह दलील दी गयी थी कि अभियोजन पक्ष के बयान के अनुसार, बरी किए गए आरोपी ने गवाहों पर भी गोलियां चलाई थीं, लेकिन किसी को चोट नहीं आई थी और न ही कोई अन्य हथियार बरामद किया गया था। यह भी दलील दी गयी थी कि मृतक को तीन व्यक्तियों द्वारा पकड़ा जाना संभव नहीं था।

गौरतलब है कि आगे यह तर्क दिया गया था कि आरोपी/दोषी लखन उर्फ बबलू ने मृतक के बाएं हाथ पर तमंचा की बैरल लगाकर गोली चलाई थी जैसा कि जख्म के पूर्व-पोस्टमार्टम से स्पष्ट है और गलती से गोली मृतक के हाथ से होते हुए शरीर के बाहर निकलने से पहले दिल में छेद कर गई थी।

इसलिए यह दलील दी गयी थी कि आरोपी लखन उर्फ बबलू का मृतक की हत्या करने का कोई इरादा नहीं था, क्योंकि अगर उसकी मंशा होती तो वह सीधे सीने पर गोली चला सकता था। इसलिए यह मामला आईपीसी की धारा 304 के दायरे से बाहर नहीं जा सकता।

कोर्ट की टिप्पणियां

शुरुआत में, कोर्ट ने कहा कि जहां तक आरोपी व्यक्तियों को बरी करने का सवाल है, ट्रायल कोर्ट ने नोट किया था कि अभियोजन पक्ष के गवाह निहित स्वार्थ वाले गवाह थे और उनकी गवाही को पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं पाया गया था, क्योंकि उनकी गवाही में कई विरोधाभास थे।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को न्यायोचित पाते हुए कोर्ट ने कहा,

"हमने निचली अदालत के समक्ष अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में भी कई बदलाव पाए हैं। यह विश्वास करना भी बहुत कठिन है कि आरोपी व्यक्तियों द्वारा अन्य व्यक्तियों पर गोलीबारी करने के बावजूद किसी को भी चोट नहीं आई है और इस कोण से साक्ष्य का विश्लेषण किया गया है कि तीन बरी किए गए अभियुक्तों ने एक साथ मृतक को पकड़ रखा था, तो उनके भी जख्मी होने की पूरी आशंका थी, लेकिन यह अभियोजन पक्ष की नजर में नहीं आया।''

इस पृष्ठभूमि के विपरीत, कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त व्यक्तियों को बरी करने के संबंध में ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया विचार सही था और इसलिए, विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को बरकरार रखा और इस प्रकार व्यवस्था दी :

"... यदि अभियुक्त को बरी करते समय ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया विचार साक्ष्य को स्थानांतरित करने के आधार पर एक संभावित, उचित दृष्टिकोण था, तो हाईकोर्ट को इस तरह के बरी होने के मामले में महज इसलिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए कि कोई और दृष्टिकोण आ सके।"

नतीजतन, कोर्ट ने माना कि आरोपियों को बरी किये जाने के आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है और राज्य सरकार द्वारा दायर की गई अपील खारिज किए जाने योग्य है।

अब, लखन उर्फ बबलू की दोषसिद्धि के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि गवाहों के साक्ष्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित चिकित्सा साक्ष्य को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि उसकी दोषसिद्धि उचित थी।

हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट और रिकॉर्ड पर रखे गये सबूतों को देखते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह अपराध आईपीसी की धारा 304 भाग-I के तहत दंडनीय होगा।

इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए, कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की:

"रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों से पता चलता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अभियोजन का मामला है कि आरोपी-लखन उर्फ बबलू ने केवल एक ही गोली चलाई थी, वह भी मृतक के बाएं हाथ पर हथियार की बैरल डालकर। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि गोली मृतक के बाएं हाथ पर लगी और बाहर निकलने का घाव भी बना और फिर मृतक के सीने में घुस गई। दूसरी गोली नहीं चलाई गयी, इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता-लखन उर्फ बबलू का मृतक की हत्या करने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन उसने जानबूझकर ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाई, जिससे मृत्यु होने की संभावना थी ..., इसलिए, मौजूदा मामला आईपीसी की धारा 300 के अपवाद 4 के तहत आता है।"

नतीजतन, अपीलकर्ता-लखन @ बबलू को आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के बजाय धारा 304 (भाग- I) के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था।

केस का शीर्षक - लखन @ बबलू बनाम यू.पी. सरकार [आपराधिक अपील संख्या – 5765/2011] सरकारी अपील के साथ सम्बद्ध

केस उद्धरण: 2022 लाइव लॉ (इलाहाबाद) 357

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



Next Story