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कोई व्यक्ति एक से अधिक मामले/अभियुक्त के लिए प्रतिभू (Surety) हो सकता है, लेकिन प्रतिभुओं की स्वीकृति और सत्यापन ट्रायल कोर्ट का विशेषाधिकार : इलाहाबाद हाईकोर्ट

SPARSH UPADHYAY
1 Aug 2020 7:56 AM GMT
कोई व्यक्ति एक से अधिक मामले/अभियुक्त के लिए प्रतिभू (Surety) हो सकता है, लेकिन प्रतिभुओं की स्वीकृति और सत्यापन ट्रायल कोर्ट का विशेषाधिकार : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को एक मामले में यह कहा कि कोई व्यक्ति एक से अधिक मामले या एक से अधिक अभियुक्त के लिए प्रतिभू (Surety) हो सकता है, लेकिन प्रतिभुओं (Sureties) की स्वीकृति और उनका सत्यापन ट्रायल कोर्ट का विशेषाधिकार है।

न्यायमूर्ति मोहम्मद फैज आलम खान की पीठ ने यह टिपण्णी उस मामले में की जहाँ अदालत के समक्ष मौजूद याचिकाकर्ता ने यह प्रस्तुत किया कि उसके खिलाफ सात मामलों में वह जमानत पर रिहा हो गया है, लेकिन COVID महामारी के कारण वह प्रत्येक मामले में दो प्रतिभुओं (Sureties) का बंदोबस्त करने में सक्षम नहीं है।

उपरोक्त के मद्देनजर, इसलिए, उसे उपरोक्त सभी मामलों में समान प्रतिभुओं (Sureties) को दाखिल करने की अनुमति दी जाए। हालाँकि, याचिकाकर्ता के लिए पेश वकील ने यह भी कहा कि उसके खिलाफ सभी सात आपराधिक मामले झूठे और मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर दर्ज किए गए थे।

अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने याचिकाकर्ता के लिए पेश वकील की इस प्रार्थना का इस आधार पर विरोध नहीं किया कि जहाँ तक प्रतिभुओं की स्वीकृति का सम्बन्ध है तो यह ट्रायल कोर्ट की विवेक और संतुष्टि पर निर्भर करता है कि वह उन्हें स्वीकार करे या नहीं।

अदालत का मत

अदालत ने अपने आदेश में यह देखा कि याचिकाकर्ता की एकमात्र शिकायत यह प्रतीत होती है कि, उसने सात मामलों में जमानत के आदेश प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन वह जेल से बाहर नहीं आ पा रहा है, क्योंकि वह प्रत्येक मामले के लिए अलग-अलग प्रतिभुओं (Sureties) का बंदोबस्त नहीं कर पा रहा है, और उसकी यह प्रार्थना है उसे यह अनुमति दी जाये कि वह सभी मामलों में सामान प्रतिभू (Sureties) दाखिल कर सके और इस संबंध में उपयुक्त दिशा-निर्देश ट्रायल कोर्ट को दिए जाएँ।

अदालत ने यह देखा कि

"प्रतिभू (Surety) की स्वीकृति और उनका सत्यापन ट्रायल कोर्ट का विशेषाधिकार है और इसे किसी भी मामले में इस कोर्ट द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में पर्याप्त दिशानिर्देश उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को प्रशासनिक पक्ष में दिए गए हैं।"

हालाँकि, जहाँ तक, याचिकाकर्ता की शिकायत का सम्बन्ध है कि वह सभी सात मामलों के लिए अलग-अलग प्रतिभुओं (Sureties) की व्यवस्था करने की स्थिति में नहीं है, अदालत ने कहा कि इस आशंका और शिकायत का जवाब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 441-ए में निहित है।

दरअसल, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 441-क़ यह कहती है कि:-

"प्रत्येक व्यक्ति जो अभियुक्त को जमानत पर छोड़े जाने के लिए प्रतिभू बने हैं, वह न्यायालय के समक्ष अभियुक्त सहित घोषणा करेंगे जिसमे सम्बंधित सभी विवरण प्रस्तुत करते हुए कि उसने कितने व्यक्तियों को प्रतिभू (Surety) दिया है।"

गौरतलब है कि यह धारा यह दर्शाती है कि, एक व्यक्ति जो किसी भी आरोपी व्यक्ति की जमानत के लिए इच्छुक है, न्यायालय के समक्ष यह घोषणा करने के लिए बाध्य है कि वह उस व्यक्ति के अलावा जिसकी जमानत के लिए वह प्रतिभू है, कितने अन्य अभियुक्त व्यक्तियों के लिए प्रतिभू रहा है।

इसलिए, यह धारा यह स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि एक व्यक्ति एक से अधिक आरोपी व्यक्ति और एक से अधिक मामलों में निश्चित रूप से खड़ा हो सकता है (प्रतिभू के तौर पर)।

अदालत ने इस मामले में आगे कहा कि

"एक व्यक्ति पर एक से अधिक मामले में और एक से अधिक आरोपी व्यक्ति के लिए जमानत देने को लेकर कोई रोक नहीं है। हालाँकि, जैसा कि पहले कहा गया है, ट्रायल न्यायालय द्वारा प्रतिभू की स्थिति, सत्यापन और उसकी योग्यता का हमेशा मूल्यांकन किया जाएगा।"

अदालत ने आगे यह साफ़ किया कि

"इसलिए यह निर्देशित किया जाता है कि, अगर यहां उल्लेख किए गए सात मामलों में एक ही प्रतिभू को ट्रायल कोर्ट के समक्ष रखा जाए और वे अन्यथा सक्षम हैं और उनकी स्थिति और अन्य विवरणों को सत्यापित किया गया है, तो ट्रायल कोर्ट अपने विवेक से सभी को सातों मामलों में समान रूप से स्वीकार कर सकती है।"

मामले का विवरण:

केस नं: MISC. SINGLE No. - 12237 of 2020

केस शीर्षक: कबीर @ कब्बू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

कोरम: न्यायमूर्ति मोहम्मद फैज़ आलम खान

आदेश की प्रति



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