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जाने-माने वकीलों को भी लंबा इंतजार करना पड़ा था, सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं हैं: सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार की लॉ स्टूडेंट्स को सलाह

LiveLaw News Network
4 Jun 2020 1:54 PM GMT
जाने-माने वकीलों को भी लंबा इंतजार करना पड़ा था, सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं हैं: सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार की लॉ स्टूडेंट्स को सलाह
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मद्रास टैक्स बार ने हाल ही में एक वेबिनार का आयोजन किया, जिसमें सीनियर एडवोकेट अरविंद पी दातार को आमं‌त्र‌ित किया गया। दातार ने वेबिनार में अपने 40 सालों की व्यावसायिक यात्रा की चर्चा की, अपनी सफलताओं और असफलताओं से जुड़े अनुभवों को साझा किया।

दातार ने संबोधन की शुरुआत बताया कि कैसे पिछले 40 सालों में उनकी प्रैक्टिस के दरमियान तकनीकी में कई व्यापक बदलाव हुए। उन्होंने कहा, "जब मैं बार में शामिल हुआ तब कम्‍प्यूटर नहीं था। मोबाइल फोन औा व्हाट्सएप भी नहीं थे। और, आज, यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि इनके बिना भी प्रैक्टिस की जा सकती है।"

दातार ने कहा कि एक वकील की जिंदगी आसान नहीं थी और "ब्रीफलेस लॉयर" उन दिनों आम बोलचाल का हिस्‍सा था।

एक छात्र और एडवोकेट के रूप में जीवन

1970 के दशक में आपातकाल के कारण डॉ अंबेडकर गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, चेन्‍नई में कक्षाएं न‌ियमित नहीं थी, दातार ने इस मौके का उपयोग मद्रास हाईकोर्ट का दौरा करने में किया। उन्होंने बताया, "इसका लाभ यह था कि मैं बहुत से वरिष्ठ वकीलों को देख पाया। सीखने का यह एक अभूतपूर्व अनुभव है। मुझे याद है कि मैंने तब सीर्वई को आधे दिन तक सुना था।"

दातार ने कहा, "एक सबक, जो वहां सीखा जा सकता था वह यह था कि मैंने वहां कई महान वकीलों को बहस करते हुए देखा। मैंने उन्हें सुनते हुए यह देखने की कोशिश की कि उनका प्लस पॉइंट क्या है और माइनस पॉइंट क्या है।"

दातार ने बताया कि वह टैक्स लॉ की प्रैक्टिस करना चाहते थे, लेकिन उन्हें सिविल लॉ की प्रैक्टिस करने की सलाह दी गई। उन्होंने बताया कि जानेमाने वकील अशोक कुमार सेन ने भी विशेषज्ञता पाने से पहले स‌िव‌िल लॉ की प्रैक्टिस की थी।

दातार ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने एक साल तक सिविल लॉ की प्रै‌क्टिस की और इंडिपेंडेंट होने से पहले तीन साल तक टैक्स लॉ पर काम किया।

40 साल की व्यावसायिक यात्रा की सीख

दातार ने कानून के छात्रों को सलाह दी कि करियर के शुरुआती वर्षों में प्रैक्टिस बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि चार साल की प्रैक्टिस के बाद उन्होंने स्वतंत्र कार्य करने का फैसला किया लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें कोई काम ही नहीं मिल रहा है। हालांकि, उन्होंने इसके बावजूद अदालत जाना नहीं छोड़ा।

उन्होंने बताया, "मुझे कहा गया था कि घर पर कभी मत बैठो। तुम्हारे पास काम है या नहीं, हर दिन कोर्ट जाओ। कोर्ट जाओ, घूमने जाओ और लाइब्रेरी जाओ।"

दातार ने तब दीवानी मामले लेना शुरु किया और पैसे आते रहे हैं, इसके लिए व्याख्यान देना शुरु किया। उन्होंने बताया उन दिनों रेंट कंट्रोल के मामलों के लिए 60 रुपए मिलते थे और अपील के लिए 90 रुपए।

दातार ने बताया कि उन्होंने अपने 30 वें जन्मदिन तक राष्ट्रीय स्तर पर पॉपुलर किताब लिखने का लक्ष्य रखा। 32 वर्ष की उम्र तक ऐसा करने में कामयाब रहे।

कोई शॉर्ट-कट नहीं

दातार ने स्टीफन कोवे और मैल्कम ग्लैडवेल के कामों का जिक्र करते हुए धैर्य के महत्व पर चर्चा की और कहा कि कुछ भी हासिल करने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है।

"बहुत से नामचीन वकीलों को लंबा इंतजार करना पड़ा है। इसलिए, निराश या हताश न हों। यह सामान्य है। एमसी सीतलवाड़ के पास लगभग दस साल से कोई काम नहीं था। चागला के पास 8 साल से कोई काम नहीं था। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं था।"

दातार ने छात्रों का इंटरनेट का उपयोग करना, विषयों में विशेषज्ञता हासिल करने जैसे कई मुद्दों पर सलाह दी।

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