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17 साल की मुस्लिम लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ शादी करने में सक्षम: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
27 Dec 2021 5:46 AM GMT
17 साल की मुस्लिम लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ शादी करने में सक्षम: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बुधवार को एक मुस्लिम लड़की (17 वर्ष की उम्र) को सुरक्षा प्रदान की। उक्त लड़की ने एक हिंदू व्यक्ति (33 वर्ष) से ​​शादी की। हाईकोर्ट ने कहा कि लड़की मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह योग्य उम्र की है।

जस्टिस हरनरेश सिंह गिल की पीठ दंपति (एक हिंदू पुरुष और एक मुस्लिम महिला) द्वारा दायर एक सुरक्षा याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इन्होंने एक हिंदू मंदिर में अपनी शादी की और उसके बाद अपने जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।

संक्षेप में मामला

नरगिस (17 वर्षीय) और उसके पति (33 वर्षीय) ने हाईकोर्ट से सुरक्षा की मांग करते हुए कहा कि एक बालिग मुस्लिम लड़का या मुस्लिम लड़की वह अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने के लिए स्वतंत्र है। अभिभावक के पास इस मामले में दखल देने का अधिकार नहीं है।

उनका तर्क था कि मुस्लिम कानून के अनुसार, यौवन और वयस्कता एक समान हैं। एक अनुमान है कि एक व्यक्ति 15 वर्ष की आयु में वयस्कता प्राप्त करता है। चूंकि, वर्तमान मामले में लड़का और लड़की दोनों 15 वर्ष की आयु से ऊपर हैं। इस प्रकार, उन्होंने वैध रूप से एक-दूसरे से विवाह किया और सुरक्षा की मांग की।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस संबंध में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला दिया। इसमें शौकत हुसैन और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य और यूनुस खान बनाम हरियाणा राज्य और अन्य [2014(3) आरसीआर (आपराधिक) 518 के मामले में निर्णय शामिल हैं।

न्यायालय की टिप्पणियां

कोर्ट ने कहा कि यूनुस खान मामले के मामले में कोर्ट ने यह नोट किया कि एक मुस्लिम लड़की की शादी मुसलमानों के पर्सनल लॉ का उपयोग करते हैं।

कोर्ट ने कहा,

"उपरोक्त दिए गए फैसलों के मद्देनजर, कानून स्पष्ट है कि एक मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा शासित होती है। सर दिनशाह फरदुनजी मुल्ला की पुस्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ' के अनुच्छेद 195 के अनुसार, याचिकाकर्ता नंबर एक 17 वर्ष की आयु होने के कारण अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह करने के लिए सक्षम है। याचिकाकर्ता नंबर दो की आयु लगभग 33 वर्ष बताई गई है। इस प्रकार, याचिकाकर्ता नंबर एक विवाह योग्य आयु का है जैसा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में कहा गया है।"

यह ध्यान दिया जा सकता है कि सर दिनशाह फरदुनजी मुल्ला की पुस्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ' के अनुच्छेद 195 के अनुसार, स्वस्थ दिमाग का प्रत्येक व्यस्क मुसलमान विवाह कर सकता है।

इस संबंध में न्यायालय ने आगे कहा,

"न्यायालय इस तथ्य पर अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता है कि याचिकाकर्ताओं की आशंका को दूर करने की आवश्यकता है। केवल इसलिए कि याचिकाकर्ताओं ने अपने परिवार के सदस्यों की इच्छा के विरुद्ध शादी कर ली है, उन्हें संविधान में परिकल्पित मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है।"

इस प्रकार, उपरोक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए प्रतिवादी नंबर दो वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मलेरकोटला को याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने और कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश के साथ याचिका का निपटारा किया गया।

भारत में शादी की कानूनी उम्र लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल है। यह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 द्वारा शासित है।

हालांकि, मुस्लिम कानून के तहत शादी या निकाह एक अनुबंध है। मुस्लिम कानून मान्यता देता है कि वयस्कों को अपनी मर्जी से शादी करने का अधिकार।

एक वैध मुस्लिम विवाह की शर्तें हैं:

1. दोनों व्यक्तियों को इस्लाम कबूल करना चाहिए;

2. दोनों व्यस्कता की आयु के होने चाहिए;

3. एक प्रस्ताव और स्वीकृति होनी चाहिए और दो गवाह मौजूद होने चाहिए;

4. डोवर और मेहर; तथा

5. संबंध की प्रतिबंधित डिग्री का अभाव।

यह ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हदिया मामले (शफीन बनाम अशोकन के.एम. और अन्य) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक वयस्क महिला की शादी की पसंद की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

15 दिसंबर, 2021 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिलाओं के लिए शादी की कानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस कदम से महिलाओं के लिए शादी की कानूनी उम्र पुरुषों के बराबर हो जाएगी जो 21 साल है।

केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में "बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021" पेश किया, जो सभी धर्मों में महिलाओं के लिए विवाह की आयु को 21 वर्ष तक बढ़ाने का प्रयास करता है।

केस का शीर्षक - नरगिस और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य

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