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दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया कस्टम को निर्देश,केन्याई निवासी को दे 93 लाख रुपए,बिना नोटिस के बेच दिया था उसका सोना [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
1 Jun 2019 8:29 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया कस्टम को निर्देश,केन्याई निवासी को दे 93 लाख रुपए,बिना नोटिस के बेच दिया था उसका सोना [आर्डर पढ़े]
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एक महत्वपूर्ण आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने कस्टम अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह केन्याई निवासी को 93 लाख 34 हजार 783 रुपए दे क्योंकि कस्टम ने उसका सोना जब्त किया और बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए ही उसे बेचदिया।

यह आदेश दो सदस्यीय खंडपीठ के न्यायमूर्ति एस.मुरलीधर और आई.एस मेहता ने एक केन्याई महिला झीनीत बानू नजीर दादनी की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है। 5 जनवरी 2015 को दिल्ली एयरपोर्ट पर उसका 3732.8ग्राम सोना कस्टम विभाग ने सीज कर लिया था।

झीनीत ने दावा किया है कि वह भारत में गहने बनवाने के इरादे से सोना लाई थी और वापिस ले जाकर उनको केन्या में बेचना चाहती थी। कस्टम अधिकारियों का कहना है कि वह अपने साथ लाए सोने के बारे में बताए बिना ही 'ग्रीन चैनल' सेनिकलने की कोशिश कर रही थी। इसलिए इस सोने को कस्टम एक्ट की धारा 110 के तहत सीज किया गया था क्योंकि इसे कस्टम ड्यूटी दिए बिना भारत में अवैध तरीके से लाया जा रहा था।

सोना वापिस न मिलने से असंतुष्ट होकर उसने वर्ष 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट में यह कहते हुए रिट पैटिशन दायर की कि उसे कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया।

याचिका के विरोध में काफी देरी से विभाग ने अपना हलफनामा दायर करते हुए कहा कि 30 जून 2015 को झीनीत को एंबेसी के जरिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। हालांकि 11 नवंबर 2015 को केन्यन एंबेसी ने अपने जबाव मेंबताया कि वह अपने बताए गए पते पर नहीं रहती है।विभाग ने यह भी बताया कि अधिनिर्णय का आदेश महिला के खिलाफ 15 जनवरी 2019 को पास किया गया था,जिसके बाद नीलामी के जरिए सोने को बेच दिया गया।

कोर्ट ने इस तथ्य को अपवाद माना कि कस्टम विभाग ने एक केन्याई निवासी के खिलाफ स्थगन आदेश पारित कर दिया और उसे नोटिस जारी किए बिना की उसके सोने का निपटान कर दिया।

कस्टम एक्ट की धारा 110(2) रिड विद 124(1)(ए) के तहत जब्त किए जाने के छह महीने के अंदर कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब्त किए जाने के बाद विभाग ने कारण बताओ नोटिस तामील करवाने के लिएकोई प्रयास नहीं किया।कोर्ट ने यह भी पाया कि केन्याई महिला को बिना नोटिस दिए ही स्थगन या अधिनिर्णय आदेश दे दिया गया,जबकि यह पता था कि हाईकोर्ट में रिट पैटिशन लंबित है। फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति मुरलीधर ने कहाकि-

''छगनलाल गेनमुल बनाम कलेक्टर ऑफ़ सेंट्रल एक्साईज 1999(109)ई.एल.टी 21(एससी) के मामले में बताया गया है कि अगर सीज करने के छह माह के अंदर एससीएन न जारी किया जाए तो इसका परिणाम यह होगा कि जिस व्यक्ति सेसोना जब्त किया गया था,वह उसे वापिस पाने का हकदार बन जाएगा। इस केस में दिया गया स्थगन आदेश भी अवैध है क्योंकि कमीश्नर ने असल में याचिकाकर्ता को बिना एससीएन तामील करवाए एक तरफा आदेश दिया था।''

इस मामले में दूसरी अवैधता यह है कि सोने का निपटारा बिना नोटिस जारी किए ही कर दिया गया। धारा 110(1)(ए) के तहत सीज सामान का निपटारा करने से पहले उसके मालिक को नोटिस जारी करना जरूरी है। पीठ ने कहा कि-

"प्रतिवादी इस बात के लिए कोई कारण नहीं बता पाए कि क्यों वह सोने का निपटारा करने के लिए मजबूर थे,जबकि वह न तो खराब होने वाली वस्तु थी और न ही खतरनाक था।न ही इस बात का जवाब दिया गया कि जिस व्यक्ति से इसे सीजकिया गया था,उसे नोटिस जारी किए बिना ही इसका निपटारा क्यों किया गया।''

कोर्ट ने यह भी कहा कि-
"इस मामले में सीज किया गया सामान खराब होने वाला नहीं था क्योंकि वह सोने की सिल थी। इसलिए प्रतिवादी के पास कोई ऐसा कारण नहीं था कि वह इसका निपटारा जल्दी से कर दे और वह भी याचिकाकर्ता को बिना नोटिस जारी किए।जब यह स्पष्ट था कि याचिकाकर्ता को एससीएन तामील नहीं करवाया गया तो ऐसे में बिना नोटिस के इसका निपटारा करने का कोई कारण नहीं बनता था। ऐसा लग रहा है कि यह याचिका दायर होने के बाद प्रतिवादी ने ऐसा जल्दबाजी मेंकिया है और सोने को सीज किए हुए चार साल से ज्यादा समय बीतने के बाद स्थगन का आदेश दे दिया है ।''

इन आधार पर कोर्ट ने यह याचिका स्वीकार की और विभाग को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता को 93लाख 34 हजार 783 रुपए उस सोने के मूल्य के दे,जो उससे जब्त किया गया था। सोने के इस मूल्य का आकलन आधिकारिकमूल्यांकक ने किया है।


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