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वैधानिक प्रावधानों पर ग़ौर किए बिना अपने फ़ैसले की समीक्षा करने वाले हाईकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना; कहा– किसी भी पक्ष को यह नहीं हो कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
13 July 2019 6:14 AM GMT
वैधानिक प्रावधानों पर ग़ौर किए बिना अपने फ़ैसले की समीक्षा करने वाले हाईकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना; कहा– किसी भी पक्ष को यह नहीं हो कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने वैधानिक प्रावधानों पर ग़ौर किए बिना कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फ़ैसले की समीक्षा को सही बताया और कहा कि किसी भी पक्ष को यह नहीं लगना चाहिए कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 293 किसी राजस्व या आय कर अथॉरिटी के ख़िलाफ़ किसी भी दीवानी अदालत में मामला दायर करने पर रोक लगाता है। इस प्रावधान पर ग़ौर किए बिना एकल पीठ ने पक्षों को (जिसमें एक पक्ष आय कर अथॉरिटीज़ भी था) को ज़िला अदालत भेज दिया। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में दीवानी मामला दायर करने की अनुमति दे दी।

बाद में पीठ ने एक समीक्षा याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया और रिट याचिका को दुबारा बहाल कर दिया। इस आदेश को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने इस अपील को ख़ारिज करते हुए कहा,

अगर आयकर अधिनियम की धारा 293 के तहत कोई दीवानी मामला दायर नहीं किया जा सकता और अगर प्रतिवादी और आय कर अथॉरिटी का यह तथाकथित बचाव है और जिसका परिणाम 8 सितम्बर 1965 को दिया गया आदेश नम्बर 21 है, जिसका उल्लेख हमने किया है, तो किसी भी पक्ष को यह नहीं लगना चाहिए कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ है और एक पक्ष ने अदालत के समक्ष जो भी शिकायत की है, उसकी जाँच उसके गुण-दोष के आधार पर होनी चाहिए।

पीठ ने इस संबंध में कमलेश वर्मा बनाम मायावती मामले में दिए गए फ़ैसले का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया था कि:

(i) जब समीक्षा स्वीकार्य होगी : नए और महत्त्वपूर्ण तथ्यों का सामने आना जिसके बारे में याचिकाकर्ता को जानकारी नहीं थी और जिसे वह पेश नहीं कर पाया; (ii) तथ्यों की वजह से हुई आभासी ग़लती; और (iii) कोई अन्य पर्याप्त कारण।

(ii) जब समीक्षा मान्य नहीं होगी : (i) पुरानी दलील का दुहराव या ऐसी दलील जिसे रद्द किया जा चुका है (ii) मामूली ग़लती जिसका फ़ैसले पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है (iii) समीक्षा की कार्यवाही की तुलना मामले की मूल सुनवाई से नहीं की जा सकती(iv) समीक्षा तब तक मान्य नहीं है जब तक कि ग़लती फ़ैसले की सार्थकता को नज़रंदाज़ करता है या न्याय दिलाने में विफलता का कारण होता है। (v) समीक्षा की आड़ में अपील मान्य नहीं होगा। (vi) किसी मुद्दे पर दो विचार की संभावना समीक्षा का आधार नहीं बन सकती (vii) रिकॉर्ड को देखते हुए आभासी ग़लती ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसे खोजकर निकालना पड़े। (viii) पेश सबूत में वृद्धि करना पूरी तरह अदालत के अधिकार क्षेत्र में है और समीक्षा याचिका में इसे आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। (ix)समीक्षा उस समय स्वीकार्य नहीं है अगर जिस राहत की माँग की गई है उसे मूल बातों पर दलील के समय ठुकराया जा चुका है।


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