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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी घरों में रहने का किराया चुकाने को कहा; 'बहुमूल्य सेवा' की दलील ख़ारिज की [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
9 May 2019 4:25 PM GMT
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी घरों में रहने का किराया चुकाने को कहा; बहुमूल्य सेवा की दलील ख़ारिज की [निर्णय पढ़े]
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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के चार पूर्व मुख्यमंत्रियों को उस आवास का किराया छह माह के अंदर चुकाने को कहा है जहाँ वे पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में रहे हैं। कोर्ट ने उन्हें बिजली, पेट्रोल, तेल आदि का शुल्क भी चुकाने को कहा है। कोर्ट नेराज्य सरकार की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि इन लोगों ने अपने कार्यकाल के दौरान 'बहुमूल्य सेवा' दी है इसलिए इनसे कोई शुल्क नहीं वसूला जाए।

"अगर मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए उनकी सेवा को बहुमूल्य मान भी लिया जाए तो भी उनको इस तरह का लाभ पहुँचाने का कोई औचित्य नहीं है," यह कहना था मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथ और आरसी खुल्बे का।

कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, बीसी खंडूरी, विजय बहुगुणा और भगत सिंघ कोश्यारी को आदेश देकर बाज़ार की दर पर उन भवनों का किराया चुकाने को कहा है जिसमें वे रहे हैं। नारायण दत्त तिवारी का नाम भी उन पूर्वमुख्यमंत्रियों में शामिल है जिन्होंने पद पर नहीं रहने के बाद भी सरकारी आवास में मुफ़्त रहे हैं पर इस याचिका पर फ़ैसला होने से पहले ही जिनका देहांत हो गया।

अदालत ने इस दलील को नकार दिया कि उन्हें ₹1000 से ₹1200 तक का नाम मात्र का किराया वसूला जाए और कहा कि इन लोगों को बाज़ार की दर से इन किरायों का भुगतान करना पड़ेगा।

पर अदालत ने इतना ही नहीं कहा।

अदालत ने सरकार से कहा है कि वह चार महीने के अंदर इस बात को निर्धारित करे कि किस व्यक्ति से कितनी राशि वसूली जानी है और उनसे बिजली, पानी, पेट्रोल, तेल और लब्रिकेंट्स के लिए कितनी राशि वसूली जानी है जो उन्हें सरकारने पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में उपलब्ध कराया। इन लोगों को यह राशि छह माह के भीतर चुकानी होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो क़ानून के अनुसार उनसे यह राशि वसूली जाएगी और उनके ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रेमिसेज़ (एविक्शनअव अनऔथोराइज्ड ओक्यूपैंट्स) एक्ट, 1997 के तहत कार्रवाई होगी।

अदालत में अपने हलफ़नामे में राज्य के अतिरिक्त सचिव/परिसंपत्ति अधिकारी ने रमेश चंद्रा पोखरियल निशंक से कितना पैसा वसूला जाना है इसकी गणना की है। निशंक 11 सितम्बर 2011 से 13 दिसम्बर 2016 तक सरकारी आवास पर रहेऔर उन्हें इसके लिए ₹41.64 लाख चुकाने होंगे।

बीसी खंडूरी ने 26 जनवरी 2010 से 10 सितम्बर 2011 और 7 मार्च 2012 से 29 नवम्बर 2016 तक सरकारी आवास में रहे और उनको सरकार को किराए के रूप में ₹48.49 लाख चुकाने हैं।

विजय बहुगुणा 3 फ़रवरी 2014 से 12 फ़रवरी 2014तक और फिर 16 जून 2015 से 15 फ़रवरी 2017 तक सरकारी आवास में रहे और उन्हें ₹37.90 लाख रुपए चुकाने होंगे।

भगत सिंह कोश्यारी 18 दिसंबर 2003 से 19 नवम्बर 2016 तक सरकारी आवास में रहने के कारण ₹47.57 लाख रुपए सरकार को देने होंगे जब कि नारायण दत्त तिवारी 29 फ़रवरी 2007 से 15 फ़रवरी 2017 तक सरकारी आवास में रहेऔर उन्हें ₹1,12,98,182 चुकाना होगा।

विजय बहुगुणा ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने न केवल बीजापुर गेस्टहाउस को ताउम्र अपने नाम कर लिया और सरकारी ख़ज़ाने से इसकी मरम्मत कराने के लिए करोड़ों रुपए भी निकलवा लिए। पीठ ने इस पर अपनी टिप्पणी में कहा, "…न केवल छठे प्रतिवादी ने ख़ुद को ऐसे लाभ दिलाए जिसका वह क़ानूनी रूप से हक़दार नहीं था बल्कि उनके पद से हटने के बाद भी राज्य सरकार ने इस तरह के आवंटन को रद्द नहीं किया। छठे प्रतिवादी का ख़ुद को इस तरह केरिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों से लैश करना जबकि वह ख़ुद उस समय मुख्यमंत्री थे, राज्य की कार्यपालिका की बहुत ही ख़राब तस्वीर पेश करती है। और यह कि इस तरह की परम्परा को जारी रहने दिया गया और यह निर्बाध जारी है,निस्संदेह गंभीर चिंता का विषय है।"

अदालत का यह आदेश उत्तराखंड के एक एनजीओ रुरल लिटिगेशन एंड एनटाइटलमेंट केंद्र (आरलेक) की याचिका पर दिया है। एनजीओ के पक्ष में अपनी दलील रखते हुए उसके वक़ील कार्तिकेय हरी गुप्ता ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों कोमुफ़्त आवास और अन्य सुविधाएँ देने का सरकारी ख़ज़ाने पर प्रतिकूल असर पड़ा है विशेषकर उत्तराखंड पर जो अभी भी उस प्राकृतिक आपदा से उबरने की कोशिश कर रहा है जो वहाँ कुछ साल पहले आई थी। उन्होंने कहा कि इस तरह केअवांछित ख़र्च सार्वजनिक धन का अनावश्यक अपव्यय है जबक राज्य के 2008-09 के वार्षिक वित्तीय विवरणों के अनुसार यहाँ के लोगों की प्रतिव्यक्ति आमदनी राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

बहुमूल्य सेवा की बात दिखावटी है

अदालत ने सरकार की इस दलील को दिखावटी बताया कि मंत्री परिषद ने इस अदालत से यह आग्रह करने का निर्णय लिया है कि मुफ़्त आवास में रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों से बक़ाया किराया नहीं लिया जाए क्योंकि पद पर रहते हुए उन्होंनेराज्य की बहुमूल्य सेवा की है।

"न तो मंत्रिपरिषद का निर्णय और न ही अतिरिक्त सचिव द्वारा दायर जवाबी हलफ़नामे में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि प्रतिवादी नम्बर 2 से 6 ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद क्या सेवा की है (अगर उन्होंने बहुमूल्य सेवा दी है)।प्रतिवादी नम्बर 2 से 6 में से जिन्होंने भी मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद किसी और पद पर नियुक्त हुए उन्हें उस पद के अनुरूप सुविधाएँ दी गईं। पर इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य सरकार अपना बहुमूल्य सार्वजनिक संसाधन उन परयह कहते हुए लुटाए कि उन्होंने पद पर रहते हुए राज्य की बहुमूल्य सेवा की है और सरकारी ख़ज़ाने को मुश्किल में डाले विशेषकर तब जब वह पहले से भारी बोझ तले दबा हुआ है। प्रतिवादी नम्बर 2 से 6 ने मुख्यमंत्री के रूप में जो सेवा की(अगर इन्हें बहुमूल्य मान भी लिया जाए तो) भी तो उन पर इस तरह से पैसे लुटाना उचित नहीं है," पीठ ने कहा।

गुप्ता ने कहा कि राज्य सरकार ने राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को ग़ैर क़ानूनी रूप से विभिन्न तरह की सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर ₹9,28,69,973 ख़र्च किए हैं और इन ख़र्चों के लिए कोई वैधानिक अनुमति नहीं ली गई।

किरायामुक्त आवास का प्रावधान

सरकार ने उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रेमिसेज़ (एविक्शन अव अनऔथोराइज्ड ओक्यूपैंट्स) एक्ट, 1997 पर भरोसा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्रियों को मुफ़्त आवास की सुविधा उपलब्ध कराई। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लोक प्रहरी के मामले में इससेग़ैरक़ानूनी घोषित कर चुका है।

1997 के अधिनियम के तहत ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्रतिवादियों (पूर्व मुख्यमंत्रियों) को देहरादून में मुफ़्त आवास मुहैया कराए जाएँ।

पूर्व मुख्यमंत्रियों से कितना किराया वसूला जाना चाहिए?

लोक प्रहरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में आए फ़ैसले पर भरोसा करते हुए पीठ ने कहा कि फ़ैसले में 'उचित किराया' को संदर्भ से बाहर जाकर पढ़ा नहीं जा सकता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के पूर्व हिस्से में कहा है किसरकारी परिसंपत्ति पर्याप्त बाज़ार-आधारित किराए के बिना नहीं आवंटित किया जा सकता।

"चूँकि पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगालों का आवंटन ही ग़ैरक़ानूनी है, ग़ैर सरकारी प्रतिवादी (जिनमें सारे पूर्व मूख्यमंत्री हैं) को ऐसे लाभ मिले हैं जिनके वे क़ानूनन हक़दार नहीं हैं। अपने कार्यालयों और प्रतिष्ठानों के लिए भवन किराए पर लेने में राज्यसरकार को अपने ख़ज़ाने से भारी राशि ख़र्च करनी पड़ती है। अगर पूर्व मुख्यमंत्रियों को देहरादून में जिस तरह के महँगे आवास मुफ़्त उपलब्ध कराए गए थे उनका प्रयोग सरकारी मुलाजिमों के कार्यालय के रूप में किया जा सकता था। चूँकिसरकारी बंगालों में सरकारी मुलाजिमों को रखने के बजाय इन्हें बंगले किराए लिए बिना ही पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास के रूप में उपलब्ध कराए गए थे, यह उचित है कि वे लोग जितनी अवधि तक इस तरह के बंगले में रहे हैं, उसके लिए उनसेबाज़ार की दर पर किराया वसूला जाए।

विवंध

कोर्ट ने प्रतिवादियों द्वारा विवंध की दलील को अस्वीकार कर दिया और कहा कि क़ानून और सार्वजनिक नीति के ख़िलाफ़ विवंध नहीं हो सकता है।

"क़ानूनसम्मत कार्रवाई नहीं होने पर कोई भी विवंध उसे क़ानूनी नहीं बना सकता है और कोई भी अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर काम करने के लिए विवंध से बंधा नहीं होता है। वर्तमान मामले में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवासीयबंगलों का आवंटन और कई अन्य सुविधाएँ मुहैया कराना उन अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात थी क्योंकि इसके लिए राज्यपाल की अनुमति नहीं ली गई और संबंधित पूर्व मुख्यमंत्रियों को इस तरह की सुविधाएँ नहीं दी जानीचाहिए थीं। इसलिए चौथा प्रतिवादी यह नहीं कह सकता कि विवंध के आधार पर राज्य सरकार उक्त राशि नहीं वसूल सकती है," पीठ ने कहा।


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