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मानसिक बीमारी से ग्रसित हर व्यक्ति को है गरिमा के साथ जीने का अधिकार-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
31 May 2019 4:18 AM GMT
मानसिक बीमारी से ग्रसित हर व्यक्ति को है गरिमा के साथ जीने का अधिकार-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दिए अपने एक फैसले में कहा है कि मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017 यानि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के तहत मानसिक बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को यह वैधानिक अधिकार है कि वह गरिमा के साथ जिए।

जस्टिस एन.वी रमाना, जस्टिस मोहन एम.शांतनागौड़र और जस्टिस इंद्रा बनर्जी की पीठ ने कहा कि मेंटल हेल्थ की धारा 20(1) स्पष्ट रूप से बताती है कि 'मानसिक बीमारी से ग्रसित हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।'
कोर्ट ने आरोपी एक्स बनाम महाराष्ट्र सरकार के मामले में कहा कि सजा के बाद मानसिक रूप से बीमार हो जाने को ,फांसी की सजा पाए आरोपियों की अपील पर सुनवाई के दौरान इसे गंभीरता कम करने वाला एक तथ्य माना जाएगा। अदालत ने दो लड़कियों से दुष्कर्म करने व उनकी हत्या करने के मामले में फांसी की सजा पाए आरोपी को फांसी की सजा से राहत दे दी है या सजा बदल दी है।
''सभी मनुष्यों के पास अपने स्वभाव में निहित क्षमताएं होती हैं,भले ही शैशवावस्था,विकलांगता या शीलता के कारण,वे अभी तक ना हो या अभी नहीं है या उनके पास इस्तेमाल की क्षमता न हो। जब ऐसी विकलांगता होती है,एक व्यक्ति अपने कार्यो के निहितार्थ और उसके परिणामों को समझने की स्थिति में नहीं होता है। इस स्थिति में ऐसे व्यक्ति को फांसी देना या उसका निष्पादन करना कानून की महिमा को कम करेगा।''
इस मामले में कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है िकवह आरोपी के असली नाम का खुलासा न करे। कोर्ट ने कहा कि -
''मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम या मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 की 23(1),(एक्ट 10 आफॅ 2017) और आरोपी के निजता के अधिकार के अनुसार,इस निर्णय पर आगे की कार्रवाई करते हुए हम रजिस्ट्री को निर्देश देते है कि आरोपी के वास्तविक नाम और अन्य प्रांसगिक जानकारी,जो उसकी पहचान को उजागर कर सकती है,का खुलासा न किया जाए। चूंकि यह गोपनीय जानकारी से संबंधित है। इसलिए हम इस मामले में आरोपी को एक्स कहकर बुला रहे है या संबोधित कर रहे है।''
कोर्ट ने यह भी माना कि सजा के बाद गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित होना,अपराध की गंभीरता को कम करने वाला एक कारक होगा,जिस पर उचित मामलों में अपीलीय कोर्ट को,एक आरोपी को फांसी की सजा सुनाते समय विचार करने की जरूरत है।

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