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पीड़ित को दंडाधिकारी के समक्ष सुनवाई में सहायता करने का अधिकार, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
8 Aug 2019 4:42 PM GMT
पीड़ित को दंडाधिकारी के समक्ष सुनवाई में सहायता करने का अधिकार, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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दंडाधिकारी सिर्फ पूछने या कहने भर से अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है,परंतु पीड़ित को यह अधिकार है कि दंडाधिकारी के समक्ष सुनवाई में सहायता कर सके। दंडाधिकारी इस बात पर विचार कर सकता है कि पीड़ित कोर्ट की सहायता करने की स्थिति में है और क्या सुनवाई में ऐसी कोई जटिलताएं शामिल नहीं है,जिन्हें पीड़ित द्वारा नियंत्रित न किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हालांकि दंडाधिकारी केवल पीड़ित के कहने या पूछने के आधार पर उसे मुकदमा चलाने या पैरवी करने की अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है,लेकिन पीड़ित को दंडाधिकारी के समक्ष सुनवाई में सहायता करने का अधिकार है।

जस्टिस एल.नागेश्वर राॅव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि अगर दंडाधिकारी इस बात से संतुष्ट हैं कि पीड़ित कोर्ट की सहायता करने में स्थिति में है और मुकदमे में ऐसी जटिलताएं शामिल नहीं है,जिन्हें पीड़ित द्वारा नियंत्रित ना किया जा सके तो यह उसके अधिकार क्षेत्र में होगा कि वह पीड़ित को दंडाधिकार के समक्ष लंबित या पेंडेंसी की जांच करने की अनुमति दे दे।

इस मामले में (अमिर हमजा शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य), हाईकोर्ट ने से भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए, 406 रेड विद 34 के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी थी। शीर्ष कोर्ट के समक्ष अपील दायर हुई तो शीर्ष कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने संबंधित पैरामीटर का निरीक्षण किए बिना ही इसकी अनुमति दे दी।

पूर्व में दिए गए कई फैसलों का हवाला देते हुए, जिनमें मल्लिकार्जुन कोडागली (मृतक) प्रतिनिधित्व किया एलआरएस बनाम कनार्टक राज्य,पीठ ने कहा कि-

"हमने पाया है कि हालांकि दंडाधिकारी सिर्फ पूछने या कहने भर से अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है,परंतु पीड़ित को यह अधिकार है कि दंडाधिकारी के समक्ष सुनवाई में सहायता कर सके। दंडाधिकारी इस बात पर विचार कर सकता है कि पीड़ित कोर्ट की सहायता करने की स्थिति में है और क्या सुनवाई में ऐसी कोई जटिलताएं शामिल नहीं है,जिन्हें पीड़ित द्वारा नियंत्रित न किया जा सके। इन सब तथ्यों से संतुष्ट होने के बाद दंडाधिकारी अपने अधिकारक्षेत्र के तहत पीड़ित को इस बात की अनुमति दे सकता है कि वह दंडाधिकारी के समक्ष लंबित या पेंडेंसी की जांच कर सके।"

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मल्लिकार्जुन कोडागली मामले में कोर्ट ने मलीमैथ समिति को मंजूरी दी,जिसमें सत्य की खोज के लिए पीड़ित को आपराधिक कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार-जिसमें निहित होने का अधिकार,जानने का अधिकार,सुनवाई का अधिकार और न्यायालय की सहायता करने का अधिकार शामिल है,को मान्यता दी गई।



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