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मुस्लिम पतियों के खिलाफ अनुचित भेदभाव वाला कानून, ट्रिपल तलाक कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, याचिका पढ़ें

LiveLaw News Network
23 Aug 2019 6:38 AM GMT
मुस्लिम पतियों के खिलाफ अनुचित भेदभाव वाला कानून, ट्रिपल तलाक कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, याचिका पढ़ें
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जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने तीन तलाक कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुताबिक मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 (अधिनियम) का एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम पतियों को सज़ा देना है। यह भी कहा गया है कि मुस्लिम पतियों के साथ यह भेदभाव वाला कानून है।

इससे पहले जमीयत उलेमा ए हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने तीन तलाक पर इस कानून के पारित होने पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि इस कानून से मुस्लिम तलाकशुदा महिला के साथ न्याय नहीं, बल्कि अन्याय होने की आशंका है।

ट्रिपल तलाक कानून- महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 को केंद्र सरकार द्वारा जुलाई 31, 2019 को पारित किया गया था, इस कानून में इस तरह के तलाक देने वाले मुस्लिम पुरुष को के लिए 3 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

महिला अधिकार संरक्षण कानून 2019 बिल के अनुसार एक समय में तीन तलाक देना अपराध है, इसलिए पुलिस बिना वारंट के तीन तलाक देने वाले आरोपी पति को गिरफ्तार कर सकती है। महमूद मदनी ने कहा था कि इस कानून के तहत पीड़ित महिला का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा और उसके लिए दोबारा शादी और नई जिंदगी शुरू करने का रास्ता खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इस तरह तलाक का असल मकसद ही खत्म हो जाएगा।

याचिकाकर्ता इस्लामी संस्कृति के संरक्षण सहित परोपकारी गतिविधियों में शामिल एक संगठन है और यह याचिका एडवोकेट एजाज मकबूल के माध्यम से दायर की गई है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के संदर्भ में केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल किया गया है।

अधिनियम के अधिनियमित होने की आवश्यकता वाली कोई भी परिस्थिति मौजूद नहीं है क्योंकि इस तरह के तलाक को पहले से ही सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया था। इससे इस तरह की तलाक गैर कानूनी तलाक की श्रेणी में थी और एक विवाह का उक्त घोषणा के बाद भी निर्वाह होगा। यह आगे प्रस्तुत किया गया कि इस अधिनियम को बनाते समय अंडर ट्रायल और न्यायपालिका पर अत्यधिक बोझ और उसकी दुर्दशा की ओर से आंखें मूंद ली गईं।



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