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अवमानना का दीवानी मामला गठित करने के लिए यह स्थापित करना जरूरी कि अवज्ञा दुराग्रहपूर्ण, जानबूझकर और परिणाम की पूर्ण जानकारी के बावजूद की गयी हो : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
22 May 2020 3:39 AM GMT
अवमानना का दीवानी मामला गठित करने के लिए यह स्थापित करना जरूरी कि अवज्ञा दुराग्रहपूर्ण, जानबूझकर और परिणाम की पूर्ण जानकारी के बावजूद की गयी हो : सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के खिलाफ अवमानना का दीवानी मामला शुरू करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया है कि कथित अवज्ञा न तो दुराग्रहपूर्ण थी, न ही जानबूझकर की गयी थी।

अवमानना की याचिका कामगारों के समूहों द्वारा दायर की गयी थी, जिसने एफसीआई में कामगारों की सेवा नियमित करने एवं विभागों का निर्धारण करने की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि एफसीआई ने औद्योगिक न्यायाधिकरण के आदेशों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन आदेशों को 2018 में की गयी पुष्टि के बावजूद कामगारों की सेवा नियमित नहीं की थी और उनके विभागों का निर्धारण नहीं किया था।

निगम ने दलील दी थी कि उसने पात्र कर्मचारियों को डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम (डीपीएसी) के तहत नियमित कर दिया है आगे कुछ और करने की जरूरत नहीं रह जाती है। एफसीआई की ओर से यह भी कहा गया कि इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के समक्ष दिये गये रेफरेंस में ठेका मजदूर प्रणाली समाप्त होने के बाद संबंधित कर्मचारियों को नियमित करने का ही केवल जिक्र था। अर्जी में संबंधित कर्मचारियों को निगम के नियमित मजदूरों की किसी खास प्रणाली के तहत रखने का अनुरोध नहीं किया गया था।

निगम में कामगारों को काम पर रखने की चार प्रणालियां हैं, जो इस प्रकार हैं – (i) डिर्पाटमेंटल लेबर सिस्टम, (ii) डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम, (iii) नो-वर्क-नो-पे सिस्टम और (iv) मेट सिस्टम।

एफसीआई ने दलील दी कि कर्मचारियों को किसी खास प्रणाली के तहत नियमित करने का कोई विशेष दिशानिर्देश नहीं था और इसलिए उन कर्मचारियों को डीपीएस के तहत काम पर रखना कोर्ट के दिशानिर्देशों पर अमल के लिए पर्याप्त था।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की खंडपीठ एफसीआई की दलीलों से सहमत नजर आई।

न्यायालय ने 'राम किशन बनाम तरुण बजाज एवं अन्य (2014) 16 एससीसी 204', के मामले में दिये गये फैसले का उल्लेख किया, जिसमें अवमानना कार्रवाई शुरू करने के लिए रूपरेखा तय की गयी है।

कोर्ट ने उस फैसले में कहा था:-

"अवमानना करने वाले व्यक्ति को सजा देने के क्रम में यह स्थापित करना होता है कि आदेश की अवमानना दुराग्रहपूर्ण या जानबूझकर की गयी है। शब्द 'विलफुल' मानसिक स्थिति को दर्शाता है और इसलिए किसी अवमाननाकर्ता की गतिविधियों को भांपकर उसकी मानसिक स्थिति का पता लगाना होता है, क्योंकि व्यक्ति की गतिविधियां ही उसकी मानसिक स्थिति का द्योतक है। 'विलफुल' का अर्थ है:- जानबूझकर इरादतन, चेतना में, सब कुछ सोचते समझते हुए तथा दुराग्रहपूर्ण तरीके से कोई कार्य करना, जिसके परिणाम के बारे में उस व्यक्ति को पता हो।"

यही बात उस आधिकारिक निर्णय में भी कही गयी थी :

"कानून का यह तय सिद्धांत है कि यदि दो अर्थ संभव हैं और यदि संबंधित कार्य दुराग्रहपूर्ण न हो तो अवमानना का मुकदमा सुनने योग्य नहीं होगा।"

इन स्थापित सिद्धांतों के आलोक में, बेंच ने इस मामले में कहा :-

"यह मानना यथेष्ट है कि अवमानना का दीवानी मामला शुरू करने के लिए यह स्थापित किया जाना जरूरी है कि आदेश की अवज्ञा दुराग्रहपूर्ण, जानबूझकर और परिणाम की जानकारी होने के बावजूद की गयी है।"

बेंच ने कहा कि संबंधित मामले में ट्रिब्यूनल ने कर्मचारियों को किसी खास प्रणाली के तहत नियमित करने के लिए विशेष निर्देश नहीं दिया था। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने केवल ट्रिब्यूनल के दिशानिर्देश की महज पुष्टि की थी।

कोर्ट ने कहा,

"संबंधित कामगारों को खास श्रमिक प्रणाली के तहत नियमित करने का मुद्दा ट्रिब्यूनल और इस अदालत के समक्ष नहीं उठाया गया था। उन कामगारों को नियमित करने एवं विभाग का निर्धारण करने का सामान्य निर्देश दिया गया था। परिणामस्वरूप प्रतिवादियों के पास इन कामगारों को संगठन की विद्यमान प्रणाली 'डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम (डीपीएस) के तहत नियमित करने का विकल्प था।"

कोर्ट ने यह कहते हुए याचिकाएं खारिज कर दी कि :-

"यह मानना यथेष्ट है कि प्रतिवादी कॉरपोरेशन और इसके अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने का मामला नहीं बनाया जा सका है। इसलिए हमें इस मामले के किसी और पहलू की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है, जिसके लिए निर्णय के पुनर्लेखन की आवश्यकता होगी, जिसके आधार पर यह अवमानना कार्रवाई शुरू की गयी है। इसे अवमानना की कार्यवाही नहीं माना जा सकता।"

केस का विस्तृत ब्योरा :

केस टाइटल : कामगार (एफसीआई लेबर फेडरेशनल के संयोजक के माध्यम से) बनाम रवुथार दाऊद नसीम एवं संबंधित मामले

केस नं. – अवमानना याचिका (सिविल) नं. 404/2019 एवं संबंधित मामले

बेंच : न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर एवं न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी

वकील : वरिष्ठ अधिवक्ता राणा मुखर्जी, वी प्रकाश, कोलिन गोंजाल्विस, बृजेन्द्र चहर (याचिकाकर्ताओं के लिए)

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, वी गिरि (प्रतिवादी की ओर से), एडवोकेट सुदर्श मेनन (हस्तक्षेप कर्ता के लिए।


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