"हैट स्पीच देने वाले जमानत पर बाहर हैं और उनका पर्दाफाश करने वाला जेल में है, यह देश क्या हो गया है?" : जुबैर मामले में कॉलिन गोंसाल्वेस ने तर्क दिये

  • हैट स्पीच देने वाले जमानत पर बाहर हैं और उनका पर्दाफाश करने वाला जेल में है, यह देश क्या हो गया है? : जुबैर मामले में कॉलिन गोंसाल्वेस ने तर्क दिये

    फैक्ट चेकिंग वेबसाइट AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ यूपी पुलिस की एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने दलील पेश की।

    कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा,

    "जिन लोगों ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया है और जिसने उन्हें उजागर किया, वह जेल में है। यह देश क्या बन गया है?"

    सीतापुर पुलिस ने जुबैर द्वारा किए गए एक ट्वीट पर एफआईआर दर्ज की थी जिसमें आरोप लगाया गया कि ज़ुबैर ने तीन हिंदू धार्मिक नेताओं यति नरसिंहानंद सरस्वती, बजरंग मुनि और आनंद स्वरूप को 'घृणा फैलाने वाले' बताया।

    गोंसाल्वेस ने प्रस्तुत किया कि जुबैर केवल इन व्यक्तियों द्वारा किए गए घृणास्पद भाषणों की रिपोर्ट कर रहे थे और पुलिस अधिकारियों का ध्यान उनके बयानों पर आकर्षित कर रहे थे।

    उन्होंने तर्क दिया कि एफआईआर मूल रूप से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 295A और अश्लील सामग्री के प्रसारण के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत दर्ज की गई थी। ट्वीट धर्म का अपमान नहीं है। इसके अलावा, इसमें कुछ भी अश्लील नहीं था।

    गोंजाल्विस ने प्रस्तुत किया कि

    "यह मेरा ट्वीट है - "अच्छा विनीत जैन, आपको नफरत करने वालों की आवश्यकता क्यों है ... जब आपके पास ऐसे......एंकर हैं।" उन्होंने लोगों को अभद्र भाषा के लिए गिरफ्तार किया है। उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया है। और अभद्र भाषा फिर से शुरू हो गई है। मैंने किसी धर्म के खिलाफ नहीं बोला है। धर्म के खिलाफ अपराध कहां है? अब देखो, नफरत फैलाने वाले लोग रिहा हो गए हैं। और यह ट्वीट करने वाला एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति जेल में है। इन व्यक्तियों को अभद्र भाषा के लिए पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है और वे जमानत पर बाहर हैं। जब मैं उन्हें नफरत फैलाने वाला कहता हूं, तो मैं गलत नहीं हूं।"

    उन्होंने कहा कि जुबैर AltNews के संस्थापकों में से एक हैं, जो फैक्ट चेक करने वाला एक प्रतिष्ठित संगठन है। उन्होंने कहा कि इस साल नोबेल शांति पुरस्कार के लिए AltNews की सिफारिश की गई है।

    जब भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि पुलिस ने आईटी अधिनियम की धारा 67 के तहत अपराध को हटा दिया है और मामले में आईपीसी की धारा 153 ए (सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देना) जोड़ी है तो गोंजाल्विस ने तर्क दिया कि यह अपराध भी नहीं बनता।

    गोंजाल्विस ने प्रस्तुत किया,

    "अगर मैं अभद्र भाषा को इंगित करने और पुलिस को रिपोर्ट करने की भूमिका निभा रहा हूं, तो यह धर्मों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा नहीं दे रहा है। मैं वास्तव में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दे रहा हूं। यहां 153A बिल्कुल भी लागू नहीं होती। मैं उनसे दुश्मनी को बढ़ावा देना बंद करने, नफरत को रोकने के लिए कह रहा हूं।"


    गोंसाल्वेस ने प्रस्तुत किया कि जुबैर ने बजरंग मुनि के भाषण का केवल एक वीडियो ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के अपहरण और बलात्कार की धमकी दी थी। गोंजाल्विस ने प्रस्तुत किया कि जुबैर वीडियो ट्वीट करके अभद्र भाषा की रिपोर्ट कर रहे थे और आपराधिक कार्रवाई की मांग करते हुए ट्वीट में सीतापुर पुलिस को टैग किया।

    उन्होंने जुबैर के लैपटॉप और मोबाइल फोन को जब्त करने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया, जबकि वह ट्वीट के लेखक होने से इनकार नहीं कर रहे हैं।

    सीतापुर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में जांच अधिकारी की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि जुबैर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए और 153 ए के तहत अपराध (क्रमशः धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देने के लिए) के तहत अपराध हैं।

    एएसजी ने तर्क दिया कि जुबैर भाषण को ट्वीट करके "हिंसा भड़का रहे थे।"

    एएसजी ने कहा, "मेरे विद्वान मित्र कहते हैं कि उन्होंने पुलिस स्टेशन को लिखा है। नहीं, वह इसे ट्वीट कर रहे हैं और सभी को इसके बारे में पता चल गया है। वह हिंसा भड़का रहे हैं।"

    एएसजी ने प्रस्तुत किया,

    "बजरंग मुनि एक सम्मानित महंत हैं ... सीतापुर में एक धार्मिक नेता हैं, जिनके बड़े अनुयायी हैं। जब आप एक धार्मिक नेता को नफरत फैलाने वाले कहते हैं, तो यह समस्या पैदा करता है। मेरे विद्वान मित्र कहते हैं कि उन्होंने पुलिस को लिखा है। यह गलत है। आपने बजरंगी बाबा के बड़ी संख्या में अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है। यह जानबूझकर है या नहीं, परीक्षण का मामला है। प्रथम दृष्टया अपराध बनता है।"

    उन्होंने कहा,

    "आप विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच धर्म असामंजस्य या द्वेष के आधार पर प्रचार करने का प्रयास कर रहे हैं। एक धार्मिक नेता को घृणा फैलाने वाला कह रहे हैं। यदि आप इतने अच्छे व्यक्ति होते तो आप पुलिस को एक पत्र भेज सकते थे। आपने ऐसा ट्वीट क्यों किया?"

    गोंजाल्विस ने जवाब मेंप्रस्तुत किया कि वह केवल बजरंग मुनि द्वारा दिए गए भाषण की रिपोर्ट कर रहे थे। उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय महिला आयोग ने यूपी के डीजीपी को दिए गए भाषण और पत्र पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की मांग की है।

    गोंजाल्विस ने रिपोर्ट के हवाले से कहा, "एनसीडब्ल्यू ने लोगों को महिलाओं के लिए इस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने से रोकने और ऐसी घटनाओं में मूकदर्शक न बने रहने के लिए पुलिस से उचित कदम उठाने की मांग की है।"

    गोंजाल्विस ने यति नरसिंहानंद के संबंध में प्रस्तुत किया कि उन्हें अभद्र भाषा के मामलों में गिरफ्तार किया गया था और भारत के एडवोकेट जनरल नेसुप्रीम कोर्ट के बारे में उनकी टिप्पणी के लिए उनके खिलाफ अदालत की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने की मंजूरी दी थी।

    "क्या मैं उन्हें बदनाम कर रहा हूं? क्या वे नफरत फैलाने वाले नहीं हैं? क्या मैं उन्हें नफरत फैलाने वाला कह रहा हूं?", गोंजाल्विस ने प्रस्तुत किया।

    भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता यूपी राज्य की ओर से पेश हुए और जुबैर की याचिका का विरोध किया और कहा कि इसकी जांच की जानी चाहिए कि "क्या वह एक ऐसे सिंडिकेट का हिस्सा है जो देश को अस्थिर करने के इरादे से नियमित रूप से ऐसे ट्वीट पोस्ट कर रहा है।

    एसजी ने कहा कि जुबैर के ट्वीट से "कानून और व्यवस्था की समस्या" हुई और उन्हें "आदतन अपराधी" के रूप में वर्णित किया, जिसके खिलाफ 6 अन्य मामले पहले से ही लंबित हैं।

    एसजी ने कहा कि जुबैर ने कई "आपत्तिजनक ट्वीट्स" हटा दिए हैं। एसजी ने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण देने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई और "कोई भी उनका बचाव नहीं कर रहा है।"

    जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी की अवकाशकालीन पीठ ने जुबैर को इस शर्त पर 5 दिनों के लिए अंतरिम जमानत देने का अंतरिम आदेश पारित किया कि वह इस दौरान कोई और ट्वीट पोस्ट नहीं करेंगे।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने एफआईआर में जांच पर रोक नहीं लगाई है और अंतरिम राहत उसके खिलाफ लंबित किसी अन्य मामले पर लागू नहीं होती है।

    अदालत एफआईआर रद्द करने से इलाहाबाद हाईकोर्ट के इनकार को चुनौती देते हुए जुबैर की एसएलपी पर विचार कर रही थी।

    आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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