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टाडा मामले : उचित अधिकारी की सहमति के बिना एफआईआर दर्ज नहीं हो सकती, जानिए सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया

LiveLaw News Network
17 Oct 2019 3:01 AM GMT
टाडा मामले : उचित अधिकारी की सहमति के बिना एफआईआर दर्ज नहीं हो सकती, जानिए सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आतंकवादी और विध्वंसकारी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (टाडा) के तहत सीआरपीसी की धारा 154 के अंतर्गत कोई एफआईआर उपयुक्त अधिकारी की सहमति के बिना दर्ज नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि टाडा अधिनियम की धारा 20A(1) के तहत यह प्रतिबंध सीआरपीसी की धारा 154 के तहत दर्ज की गई सूचना पर भी लागू होता है।

लेकिन पीठ ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध उस रुक्का या संदेश पर लागू नहीं होगा जो अनुमति मांगने के लिए पुलिस अधिकारी ज़िला पुलिस अधीक्षक को भेजते हैं। ऐसा नहीं हुआ तो कार्रवाई की अनुमति मांगने के संवाद का आदान-प्रदान नहीं होगा और टाडा क़ानून का उद्देश्य यह नहीं रहा होगा।

अदालत ने कहा कि जब बलात्कार, हत्या जैसे मामले की बात हो, पुलिस अधिकारी सूचना दर्ज कर सकते हैं और आईपीसी के तहत इस तरह के अपराध के लिए उस व्यक्ति को गिरफ़्तार कर सकते हैं पर टाडा के तहत कार्रवाई के लिए किसी उपयुक्त अधिकारी की अनुमति लेनी होगी।

एभा अर्जुन जडेजा बनाम गुजरात राज्य के आलोचय मामले में विशेष टाडा अदालत ने बरी किए जाने के आरोपी के आवेदन को ख़ारिज कर दिया था। आरोपी की दलील थी कि टाडा अधिनियम, 1987 की धारा 20A(1) का पालन नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील पर ग़ौर करते हुए स्पष्ट किया कि जहां भी सूचना में यह कहती है कि अपराध टाडा के तहत है और अन्य संबंधित अपराध इससे जुड़े हुए अपराध हैं, तो धारा 20A(1) को माने बिना सूचना दर्ज नहीं की जा सकती है।

पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा,

"…इस मामले में अपराध होने की सूचना की पुष्टि सिर्फ़ हथियार की बरामदगी से होती है। पुलिस को यह पता रहा होगा कि यह क्षेत्र टाडा के अधीन अधिसूचित क्षेत्र है और इसलिए इस क्षेत्र में इस तरह का हथियार लेकर चलना ही अपने आप में अपराध है। यह सच है कि शस्त्र अधिनियम के तहत भी यह अपराध है पर टाडा और शस्त्र अधिनियम दोनों में ही अपराध होने का आधार एक ही है – टाडा के तहत अधिसूचित क्षेत्र में प्रतिबंधित हथियार की बरामदगी।
इन दोनों ही अधिनियम में किसी अपराधी को सज़ा दिलाने के लिए ज़रूरी साक्ष्य भी समान ही हैं। बलात्कार, हत्या आदि जैसे मामले इसके तहत नहीं आते। इसलिए जहाँ तक वर्तमान मामले की बात है, धारा 20A(1) को नहीं मानना बड़ी चूक है और जहाँ तक टाडा अधिनियम की बात है, तो हमारे पास आरोपी को रिहा किए जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि वे शस्त्र अधिनियम के तहत उसके ख़िलाफ़ मामला आगे बढ़ा सकते हैं।"

अदालत ने कहा टाडा अधिनियम के तहत धारा 20A(1) को मानना आवश्यक है।

इस धारा की भाषा इस तरह की है जो इसे आवश्यक बनाता है। यह इस बात से शुरू होता है कि इसके ख़िलाफ़ चाहे कुछ भी हो, इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता (non-obstante clause)। इसमें ज़िला पुलिस अधीक्षक की पूर्व अनुमति के बिना इस अपराध के बारे में सूचना दर्ज करने की मनाही है।

धारा 20A(1) ऐसा नहीं है। यह मामला ऐसा नहीं है जिस पर निर्णय हो चुका है। रंगकु दत्ता @रंजन कुमार दत्ता बनाम असम राज्य मामले में इस अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था कि यह प्रावधान जो कि नकारात्मक रूप से सन्निहित है, उसकी प्रकृति बाध्यकारी है।

हत्या, बलात्कार, तस्करी, नशीली पदार्थों से जुड़े मामले, पोकसो अधिनियम आदि जैसे गंभीर मामले में जाँच में इसलिए देरी नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें टाडा मामला लगा है।

हर मामले का फ़ैसला उसके तथ्यों के आधार पर होता है। पुलिस अधिकारी जो कि ज़िला पुलिस अधीक्षक नहीं है, को इस तरह के अपराध के होने की सूचना प्राप्त हो सकती है और वह अपराधस्थल पर पहुँच सकते हैं। वह घटनास्थल पर सूचना दर्ज कर सकते हैं और तब वह यह रुक्का पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करने के लिए भेजता है।

हत्या, बलात्कार, मादक पदार्थों से संबंधित और पोकसो अधिनियम से संबंधित मामले भी हो सकते हैं जहाँ जाँच में देरी से भयंकर समस्या पैदा हो सकती है। उन मामलों में पुलिस अधिकारी सूचना दर्ज कर सकता है और इन सूचनाओं में कुछ ऐसी हो सकती हैं जो टाडा के अधीन अपराध की ओर संकेत करते हैं। ऐसी स्थिति में टाडा अधिनियम के तहत आने वाले अपराध के बारे में सूचना और एफआईआर दर्ज करने के दौरान, संबंधित पुलिस अधिकारी धारा 20A(1) के तहत मामला दर्ज करने के लिए ज़िला पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकता है।

अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा,

"पुलिस अधिकारी को एक लाश मिलती है और उसको लगता है कि यह हत्या का मामला लगता है, वह एक व्यक्ति को पकड़ता है जो हत्या करने के बाद वहाँ से भाग रहा होता है और उस व्यक्ति से अधिसूचित क्षेत्र में एक प्रतिबंधित आग्नेयास्त्र बरामद करता है। इस तरह की स्थिति में मुख्य अपराध हत्या है और अधिसूचित क्षेत्र में प्रतिबंधित हथियार का बरामद होना टाडा अधिनियम के तहत द्वितीयक अपराध है।

यहां पुलिस अधिकारी सूचना रेकर्ड कर सकता है और अपराधी को पकड़ सकता है पर टाडा अधिनियम के तहत कार्रवाई करने से पहले उसे धारा 20A(1) के तहत पूर्व अनुमति लेनी होगी"।

फैसले की कॉपी डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


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