सुवेंदु अधिकारी के काफिले पर हमले का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट से पूछा- क्या UAPA लगाने का आधार बनता है?
Amir Ahmad
11 Feb 2026 1:58 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कलकत्ता हाइकोर्ट से कहा कि वह राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) लागू किए जाने के औचित्य की जांच करे। यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी के काफिले पर 10 जनवरी को हुए हमले से जुड़ा है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने निर्देश दिया कि NIA इस मामले में अपनी जांच से संबंधित सामग्री कलकत्ता हाइकोर्ट के समक्ष सीलबंद लिफाफे में पेश करे ताकि यह तय किया जा सके कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर UAPA के तहत जांच का प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
यह आदेश पश्चिम बंगाल सरकार की उस याचिका पर दिया गया, जिसमें उसने 20 जनवरी को कलकत्ता हाइकोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी जिसके तहत NIA Act की धारा 6(5) के तहत एनआईए जांच पर विचार करने को कहा गया।
राज्य सरकार की याचिका का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“NIA को यह निर्देश देना पर्याप्त होगा कि वह जांच के दौरान या जांच के बाद अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में हाइकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत करे ताकि यह देखा जा सके कि एकत्रित सामग्री के आधार पर UAPA के प्रावधानों के तहत जांच का कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। चूंकि हाइकोर्ट के आदेश में UAPA लागू होने को लेकर कोई ठोस राय नहीं दी गई। इसलिए हाइकोर्ट NIA की स्थिति रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से विचार करे और आवश्यक निर्देश जारी करे।”
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा NIA जांच के निर्देश को चुनौती देने वाली पश्चिम बंगाल सरकार की एक अन्य रिट याचिका भी कलकत्ता हाइकोर्ट को ट्रांसफर कर दी गई।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से NIA से यह भी पूछा कि उसने इस घटना को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने का आधार क्या था।
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बंद्योपाध्याय ने दलील दी कि NIA Act के तहत कोई अनुसूचित अपराध इस मामले में नहीं बनता, इसलिए NIA की जांच पूरी तरह से अनुचित है। उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस पहले ही FIR दर्ज कर चुकी है और हिंसा के संबंध में गिरफ्तारियां भी की जा चुकी हैं।
वहीं केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को NIA को इस घटना की जांच सौंपने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि घटना बांग्लादेश सीमा के पास हुई और इसमें घातक हथियारों का इस्तेमाल किया गया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपराध बनते हैं। ASG ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य पुलिस सहयोग नहीं कर रही है और आवश्यक दस्तावेज सौंपने में टालमटोल कर रही है।
इस पर सीनियर एडवोकेट बंद्योपाध्याय ने सवाल उठाया कि UAPA की धारा 15(1) के तहत आतंकवाद का अपराध आखिर किस आधार पर बनता है, जब न तो विस्फोटकों का इस्तेमाल हुआ और न ही कोई ऐसा कृत्य हुआ, जो NIA Act की अनुसूची में आता हो।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
“बिना दस्तावेज़ देखे आपने यह कह दिया कि धारा 15 लागू होती है। केस डायरी आपके सामने रखी ही नहीं गई। यह एक पूर्व-निर्णयात्मक निष्कर्ष है।”
जस्टिस बागची ने आगे कहा,
“हर भावनात्मक उग्रता को आर्थिक या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अप्रैल, 2025 में हुए एक पूर्व हमले के मामले में भी हाइकोर्ट ने NIA जांच का निर्देश दिया था लेकिन उस पर एजेंसी ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और उस पर सोती रही।
अब इस पूरे विवाद पर अंतिम निर्णय कलकत्ता हाइकोर्ट द्वारा NIA की सीलबंद रिपोर्ट पर विचार करने के बाद लिया जाएगा।

