JAG पदों पर महिलाओं को 50% आरक्षण देने के निर्देश में बदलाव से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Amir Ahmad

21 Jan 2026 12:13 PM IST

  • JAG पदों पर महिलाओं को 50% आरक्षण देने के निर्देश में बदलाव से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज की, जिसमें भारतीय सेना के जज एडवोकेट जनरल (JAG) कैडर में महिलाओं को कम से कम 50 प्रतिशत पद देने संबंधी पिछले वर्ष के फैसले में संशोधन की मांग की गई।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने केंद्र द्वारा दायर विविध आवेदन (एमए) पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत के फैसले में कोई विरोधाभास नहीं है और यह निर्णय पूरी तरह सोच-समझकर दिया गया है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    गौरतलब है कि अगस्त, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना की उस नीति को असंवैधानिक ठहराया था, जिसमें JAG शाखा में पुरुषों के लिए अधिक पद आरक्षित किए गए और महिलाओं की नियुक्ति सीमित की गई। अदालत ने कहा कि JAG शाखा में पुरुष और महिला अधिकारियों के लिए कोई अलग कैडर या सेवा शर्तें नहीं हैं और इस पद का मूल कार्य कानूनी सलाह देना और मामलों की पैरवी करना है।

    अदालत ने महिलाओं के साथ पूर्व में हुए भेदभाव की भरपाई के लिए निर्देश दिया कि भविष्य में जेएजी पदों की कम से कम 50 प्रतिशत रिक्तियां महिलाओं को दी जाएं।

    केंद्र की आपत्ति

    केंद्र सरकार ने इस फैसले के अनुच्छेद में संशोधन की मांग करते हुए कहा कि मेरिट आधारित भर्ती और कम से कम 50 प्रतिशत पद महिलाओं को इन दोनों बातों में तालमेल बैठाने में कठिनाई हो रही है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह व्यवस्था कितने समय तक लागू रहेगी और इसे सीमित अवधि के लिए किया जाना चाहिए।

    खंडपीठ की टिप्पणी

    जस्टिस मनमोहन ने केंद्र की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अदालत ने केंद्र की अपनी नीति को ही प्रभावी बनाने के लिए यह निर्देश दिया।

    उन्होंने कहा कि यदि केवल मेरिट के आधार पर चयन किया जाता और महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत से कम रहती तो केंद्र की महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की नीति ही निष्प्रभावी हो जाती। इसलिए अदालत ने यह संतुलन बनाया कि महिलाओं को कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिले लेकिन यदि वे मेरिट में अधिक हों तो उनकी संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा भी हो सकती है।

    जस्टिस मनमोहन ने कहा,

    “आज भी JAG में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 38 प्रतिशत है। यदि 50 प्रतिशत की शर्त नहीं होती तो भेदभाव खत्म होने के बजाय और बढ़ जाता।”

    उन्होंने अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई उम्मीदवार सामान्य कोटे में मेरिट से चयनित हो जाता है तो उसे आरक्षित सीट में समायोजित नहीं किया जाता। यही सिद्धांत यहां लागू किया गया है।

    महिलाओं की भागीदारी पर जोर

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत ने उन शाखाओं में हस्तक्षेप नहीं किया है, जहां केंद्र सरकार की नीति के अनुसार महिलाओं की भर्ती की अनुमति नहीं है। हालांकि, जस्टिस मनमोहन ने कहा कि आबादी के 50 प्रतिशत हिस्से को सैन्य ढांचे से बाहर रखकर देश की रक्षा पूरी क्षमता से नहीं की जा सकती।

    उन्होंने टिप्पणी की,

    “आप 50 प्रतिशत आबादी को बाहर रखकर युद्ध नहीं लड़ सकते। यह ऐसा है जैसे हाथ पीछे बांधकर लड़ाई लड़ी जाए।”

    केंद्र की दलील खारिज

    केंद्र ने यह भी तर्क दिया कि JAG एक छोटी शाखा है और अन्य सैन्य शाखाओं, विशेषकर लड़ाकू इकाइयों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने से रक्षा तैयारियों पर असर पड़ सकता है। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह मामला केवल JAG शाखा से संबंधित है।

    अंततः सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का विविध आवेदन खारिज कर दिया और महिलाओं को JAG पदों में कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देने संबंधी अपनe पूर्व निर्देश बरकरार रखा।

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