संतुलित आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाइकोर्ट के फैसले पर लगाई मुहर, तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ियों पर मुस्लिम इबादत सीमित रहेगी
Amir Ahmad
9 Feb 2026 1:48 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मदुरै ज़िले की तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ियों से जुड़े विवाद में मद्रास हाइकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाइकोर्ट का आदेश संतुलित है और बिना पक्षकारों के अधिकारों पर कोई अंतिम राय दिए, वह आदेश बरकरार रहेगा।
मामला तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित नेल्लीतोप्पू क्षेत्र से जुड़ा है, जहां 33 सेंट भूमि सिकंदर बदुशा औलिया दरगाह के स्वामित्व में बताई जाती है। इसी पहाड़ी पर अरुलमिघु सुब्रमणियास्वामी थिरुकोविल मंदिर भी स्थित है। नमाज़ और पशु बलि को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है।
मद्रास हाइकोर्ट ने अक्टूबर, 2025 में अपने फैसले में कहा था कि मुस्लिम श्रद्धालुओं को नेल्लीतोप्पू क्षेत्र में केवल रमज़ान और बकरीद के अवसर पर ही नमाज़ अदा करने का अधिकार होगा। इसके साथ ही हाइकोर्ट ने इस क्षेत्र में पशु बलि की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया था।
इस फैसले को चुनौती देते हुए दरगाह में इबादत करने वाले एम. इमाम हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिका पर जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने सुनवाई की, लेकिन मद्रास हाइकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने दलील दी कि इलाके में कभी भी कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रही है।
उन्होंने कहा,
“हमारी आपत्ति 'केवल' शब्द से है कि नमाज़ सिर्फ रमज़ान और बकरीद के दिन ही हो सकती है। ट्रायल कोर्ट और प्रिवी काउंसिल के फैसलों से यह स्पष्ट है कि नेल्लीतोप्पू क्षेत्र की 33 सेंट भूमि मोहम्मडनों की है। हाइकोर्ट भी इस बात को स्वीकार करता है फिर भी नमाज़ को केवल दो त्योहारों तक सीमित कर दिया गया। अन्य शर्तें लगाई जा सकती हैं। हम कानून-व्यवस्था बनाए रखने को तैयार हैं लेकिन कभी कोई समस्या नहीं रही।”
इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि अगर कानून-व्यवस्था की कोई समस्या न होती तो शांति समिति की बैठकें ही क्यों होतीं।
उन्होंने टिप्पणी की,
“यह एक बहुत ही संतुलित आदेश प्रतीत होता है।”
जस्टिस वराले ने भी इस राय से सहमति जताई।
पीठ ने आदेश में कहा,
“हम इस आदेश में हस्तक्षेप करने का प्रस्ताव नहीं रखते। पक्षकारों के अधिकारों पर कोई राय व्यक्त किए बिना विवादित आदेश बरकरार रखा जाता है।”
यह विवाद तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर इबादत स्थलों की स्थिति को लेकर है। पहाड़ी पर नमाज़ अदा करने और पशु बलि की परंपरा को लेकर लंबे समय से मतभेद चले आ रहे हैं, क्योंकि यही मार्ग काशी विश्वनाथन मंदिर और अरुलमिघु सुब्रमणियास्वामी मंदिर तक भी जाता है।
जून, 2025 में मद्रास हाइकोर्ट की दो-जजों की पीठ ने इस मुद्दे पर विभाजित फैसला दिया था। जस्टिस निशा बानू ने पशु बलि की प्रथा में हस्तक्षेप से इनकार किया था जबकि जस्टिस एस. श्रीमथी ने कहा था कि दरगाह को पशु बलि और विभिन्न इस्लामी त्योहारों पर नमाज़ के अधिकार के लिए सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। जस्टिस श्रीमथी ने यह भी कहा था कि नेल्लीतोप्पू क्षेत्र में नमाज़ अदा करने की परंपरा हाल की है और बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने से मंदिर जाने वाले रास्ते में बाधा उत्पन्न होती है।
मतभेद के चलते मामला मद्रास हाइकोर्ट चीफ जस्टिस के पास गया, जिन्होंने इसे तीसरे जज को सौंपा। 10 अक्टूबर, 2025 को तीसरे जज ने फैसला सुनाते हुए मुस्लिम श्रद्धालुओं को केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान नमाज़ की सीमित अनुमति दी जबकि पशु बलि खाना पकाने मांस ले जाने या परोसने पर रोक लगा दी। यह भी कहा गया कि पशु बलि की परंपरा पर अंतिम फैसला सक्षम सिविल कोर्ट करेगा।
इन दोनों आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 25 के उल्लंघन का हवाला देते हुए चुनौती दी गई लेकिन अब सुप्रीम कोर्टने मद्रास हाइकोर्ट के निर्णय को संतुलित बताते हुए उसे बरकरार रखा।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष दिसंबर में मद्रास हाइकोर्ट ने दरगाह के पास स्थित दीपथून में दीप जलाने की अनुमति दी, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद हाइकोर्ट ने आदेश लागू न करने पर कानून-व्यवस्था का हवाला देने वाली राज्य सरकार को अवमानना कार्यवाही में भी कड़ी फटकार लगाई।

