दिल्ली दंगों के UAPA मामले में शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी जमानत, कहा- अभियोजन ने अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं कराई

  • दिल्ली दंगों के UAPA मामले में शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी जमानत, कहा- अभियोजन ने अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं कराई

    दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में आरोपी शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर जमानत की मांग की। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उसने दलील दी कि अभियोजन पक्ष अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं करा पाया और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत पर लगाई गई एक साल की रोक की अवधि समाप्त होने वाली है।

    गौरतलब है कि 5 जनवरी को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने शरजील इमाम और JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्हें कथित बड़ी साजिश का वैचारिक सूत्रधार बताया था। हालांकि, खंडपीठ ने गुलफिशा फातिमा समेत पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी थी। कोर्ट ने कथित साजिश में उनकी अलग-अलग भूमिकाओं को ध्यान में रखते हुए यह अंतर किया था।

    जमानत खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक साल की रोक लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि इमाम और खालिद संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या आदेश पारित होने के एक साल बाद, “जो भी पहले हो”, अदालत का रुख कर सकते हैं।

    इमाम ने अपनी याचिका में कहा कि इस मामले में 25 सितंबर, 2020 को आरोपपत्र दाखिल किया गया। कुल 18 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और अभियोजन पक्ष ने 900 से अधिक गवाहों की सूची दी है, जिनमें 47 संरक्षित गवाह शामिल हैं। इमाम के मुताबिक, विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल और नौ महीने जेल में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं करा पाया।

    इमाम ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जनवरी को जमानत खारिज किए जाने के तीन दिन बाद 8 जनवरी को उसने आरोप तय करने के मुद्दे पर अपनी दलीलें पूरी कर ली थीं। 13 जुलाई को सभी पक्षों की ओर से आरोप तय करने पर बहस पूरी हो गई।

    हालांकि, 22 जुलाई को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने विशेष अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने सह-आरोपी देवांगना कलिता को दिल्ली पुलिस द्वारा जुटाए गए उन दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति देने वाले आदेश पर रोक लगा दी है, जिन पर अभियोजन पक्ष भरोसा नहीं कर रहा है। कलिता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था, जो अभी सुनाया नहीं गया।

    इस स्थिति को देखते हुए स्पेशल कोर्ट ने आरोप तय करने का आदेश टाल दिया।

    अदालत ने कहा,

    “औचित्य की मांग है कि इस अदालत को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के निपटारे तक या सुप्रीम कोर्ट की अनुमति मिलने तक आदेश पारित करने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।”

    इमाम ने सबसे पहले ट्रायल कोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी लेकिन 4 जुलाई को उसे खारिज कर दिया गया। अदालत ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों का उल्लंघन नहीं कर सकती।

    इसके बाद 30 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने भी जमानत देने से इनकार किया। हाईकोर्ट ने भी यही कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बदलाव नहीं कर सकता।

    इमाम ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह की जांच नहीं की। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की शर्त जो भी पहले हो के तहत संरक्षित गवाहों की जांच पूरी होने की संभावना 5 जनवरी, 2026 की निर्धारित समयसीमा के भीतर नहीं दिखती।

    इमाम ने जस्टिस अरविंद कुमार के 22 मई के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को यह मामला भेजा गया। इसमें UAPA के तहत जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के फैसलों के बीच कथित मतभेद का मुद्दा उठाया गया।

    यह विवाद केए नजीब मामले के फैसले की व्याख्या को लेकर सामने आया था। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहने की स्थिति UAPA जैसे कठोर कानूनों में जमानत की सख्त शर्तों के प्रभाव को कम कर सकती है।

    यह मतभेद तब सामने आया जब जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी मामले में गुलफिशा फातिमा के फैसले की आलोचना की। पीठ ने कहा था कि उस फैसले में यूएपीए के तहत जमानत को लेकर संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया और नजीब फैसले के सिद्धांत को कमजोर किया गया।

    जस्टिस नागरत्ना की पीठ द्वारा उठाई गई आपत्तियों को देखते हुए जस्टिस कुमार की पीठ ने मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। इसी दौरान सह-आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत दी गई थी।

    अंतरिम जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों आरोपियों ने काफी समय जेल में बिताया है, मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं है और कानूनी मुद्दों के समाधान में भी समय लग सकता है। कोर्ट ने कहा था कि किसी महत्वपूर्ण कानूनी सवाल के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा के कारण आरोपियों को लगातार जेल में नहीं रखा जा सकता।

    इमाम ने लंबे समय तक हिरासत और निकट भविष्य में मुकदमा पूरा होने की संभावना न होने संबंधी इन टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा है कि उसका मामला शीघ्र सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन का उपयुक्त उदाहरण है।

    दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा FIR संख्या 59/2020 की जांच कर रही है। मामला भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया है।

    इस मामले में आरोपी ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ इकबाल तन्हा, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम खान, अतर खान, सफूरा जर्गर, शरजील इमाम, फैजान खान और नताशा नरवाल हैं।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story