आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं, लेकिन 24 घंटे प्रशिक्षित देखभाल जरूरी : AIIMS ने सुप्रीम कोर्ट से कहा
Amir Ahmad
4 Aug 2026 3:32 PM IST

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी मेडिकल रिपोर्ट में कहा कि दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को फिलहाल अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें चौबीसों घंटे प्रशिक्षित देखभाल करने वालों की सहायता की जरूरत है।
यह मामला जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष विचाराधीन है। आसाराम ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें वर्ष 2013 के दुष्कर्म मामले में उनकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया।
रिपोर्ट में बताया गया कि आसाराम कई बीमारियों से पीड़ित हैं। इनमें हृदय की धमनियों से संबंधित रोग, अस्थि क्षय (ऑस्टियोपोरोसिस), लंबे समय से शरीर में सोडियम की कमी, थैलेसीमिया तथा रक्तस्राव के साथ बार-बार होने वाली जठरांत्र संबंधी समस्याएं शामिल हैं।
गौरतलब है कि जून में सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की अपील और सजा निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था। बाद में अदालत ने AIIMS को उनका विस्तृत मेडिकल जांच करने और यह बताने का निर्देश दिया कि क्या उन्हें अस्पताल में भर्ती रखने की आवश्यकता है या नियमित दवा और उपचार पर्याप्त होगा।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि AIIMS ने अपनी रिपोर्ट दाखिल की।
रिपोर्ट के अनुसार आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें लगातार प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं की निगरानी और सहायता आवश्यक है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अनुपस्थिति के कारण सुप्रीम कोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई गुरुवार के लिए स्थगित की।
उल्लेखनीय है कि जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने अप्रैल 2018 में आसाराम को अपने आश्रम में एक युवती से दुष्कर्म करने के मामले में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत शेष जीवन तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उन्हें दुष्कर्म, मानव तस्करी, अवैध बंधक बनाने, आपराधिक धमकी और अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया था। साथ ही POCSO की विभिन्न धाराओं के तहत भी दोषसिद्ध किया गया।
बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता के अधिकांश आरोपों में उनकी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी, जबकि सामूहिक दुष्कर्म और आपराधिक साजिश के आरोपों से उन्हें राहत दी।
हाईकोर्ट ने POCSO Act के तहत दोषसिद्धि भी निरस्त कर दी थी। इसके अलावा, सह-आरोपी शरद और शिल्पी को भी बरी कर दिया गया, जिन्हें निचली अदालत ने कथित साजिश में सहयोग करने के आरोप में 20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।


