नोएडा श्रमिक प्रदर्शन मामला: पुलिस उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए लॉ स्टूडेंट पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, 11 FIR दर्ज होने का दावा

Amir Ahmad

7 Aug 2026 4:36 PM IST

  • नोएडा श्रमिक प्रदर्शन मामला: पुलिस उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए लॉ स्टूडेंट पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, 11 FIR दर्ज होने का दावा

    नोएडा श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े मामले में लॉ स्टूडेंट ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर उत्पीड़न और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान एडवोकेट शाहरुख आलम ने अदालत के समक्ष स्टूडेंट के खिलाफ कथित रूप से की जा रही पुलिस कार्रवाई को प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ दिल्ली यूनिवर्सिटी के फर्स्ट ईयर के लॉ स्टूडेंट योगेश मीणा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोप है कि पुलिस ऐसे चालक से कथित संबंध को लेकर स्टूडेंट से पूछताछ कर रही है, जिसे प्रदर्शन से जुड़े मामले में भड़काऊ मैसेज शेयर करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उसे जमानत मिल गई।

    एडवोकेट शाहरुख आलम ने अदालत को बताया कि स्टूडेंट के खिलाफ प्रदर्शन के बाद 11 FIR दर्ज की गई हैं और पुलिस उस पर मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगा रही है, जबकि इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस चालक पर मैसेज शेयर करने का आरोप है, वह जमानत पर बाहर है लेकिन छात्र अभी भी हिरासत में है।

    याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने स्टूडेंट को उसके कॉलेज के बाहर से उठाया उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक टिप्पणियां कीं।

    सुनवाई के दौरान एडवोकेट ने कहा कि 19 मई को अदालत को बताया गया कि व्हाट्सऐप ग्रुप में कुछ लोगों द्वारा भड़काऊ मैसेज प्रसारित किए जा रहे थे। इसके बाद 20 मई को एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया, जो गृह मंत्रालय में कार्यरत चालक था। इसके बाद पुलिस ने स्टूडेंट को कॉलेज के बाहर से उठाया और उससे पूछताछ शुरू कर दी कि वह चालक को कैसे जानता है या क्या उसने उसे ऐसा करने के लिए कहा था।

    जब जस्टिस नागरत्ना ने सुझाव दिया कि स्टूडेंट को जमानत के लिए उचित अदालत का रुख करना चाहिए, तो वकील ने कहा कि जमानत मांगी गई थी, लेकिन राहत नहीं मिली।

    उन्होंने कहा,

    "हम केवल यह दिखाने के लिए आपके समक्ष आए हैं कि प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा है।"

    इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कानून में उपलब्ध उपाय मौजूद हैं और केवल रिट याचिका के माध्यम से व्यक्तिगत राहत मांगना उचित प्रक्रिया को दरकिनार करने जैसा हो सकता है।

    वकील ने स्पष्ट किया कि वह जमानत या अन्य व्यक्तिगत राहत की मांग नहीं कर रही हैं, बल्कि अदालत का ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हैं कि एक युवा स्टूडेंट के साथ किस प्रकार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह मामला अनुच्छेद 14 के लगातार उल्लंघन से जुड़ा है।

    अदालत द्वारा याचिका निपटाने और उचित मंच पर राहत मांगने की स्वतंत्रता देने के सुझाव पर वकील ने मामले को लंबित रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट के खिलाफ 11 FIR दर्ज हैं और यदि हर मामले में अलग-अलग जमानत लेनी पड़ेगी तो "प्रक्रिया ही सजा बन जाएगी।"

    अदालत ने FIR रद्द कराने जैसे कानूनी उपाय अपनाने का सुझाव दिया, जिस पर वकील सहमत हुआ। हालांकि, उन्होंने कहा कि अदालत यह भी देखे कि प्रदर्शनकारियों के साथ किस तरह व्यवहार किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा,

    "वह एक स्टूडेंट है। उस पर आरोप है कि उसने ऐसे व्यक्ति को तैयार किया जो अब जमानत पर बाहर है।"

    गौरतलब है कि अप्रैल में हुए नोएडा प्रदर्शन से जुड़े दो अन्य मामले भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इनमें एक मामला सॉफ्टवेयर इंजीनियर और सोशल एक्टिविस्ट आदित्य आनंद तथा ऑटो चालक रुपेश रॉय की गिरफ्तारी से जुड़ा है। आदित्य आनंद को तमिलनाडु से और रुपेश रॉय को बॉटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार किया गया था।

    इन मामलों में हिरासत में कथित उत्पीड़न के आरोपों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले टिप्पणी की थी कि दोनों लोग वेतन वृद्धि की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और वे "आतंकवादी नहीं हैं।" अदालत ने उन्हें पेश करने का भी निर्देश दिया था।

    एक अन्य मामला पत्रकार सत्यम वर्मा से जुड़ा है, जिसमें उनकी पत्नी ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उनकी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आरोप है कि वर्मा ने प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया था।

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