अदालती कार्रवाई के अनधिकृत क्लिप्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MeitY को कार्रवाई करने का आदेश

  • अदालती कार्रवाई के अनधिकृत क्लिप्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MeitY को कार्रवाई करने का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से कहा कि वे अपनी प्रस्तावित नीति में ऐसा प्रावधान शामिल करें, जिससे कोर्ट के उन निर्देशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके, जो कोर्ट की कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो क्लिप्स को बिना अनुमति अपलोड करने पर रोक लगाते हैं।

    CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग, रिकॉर्डिंग और उसे पब्लिश करने से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

    पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि कोर्ट को मिले सुझावों को सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय तक पहुँचाया जाए। अन्य पक्षों, हस्तक्षेपकर्ताओं और हाकोर्ट्स को भी अपने सुझाव सॉलिसिटर जनरल के साथ साझा करने की अनुमति दी गई। इसके बाद सॉलिसिटर जनरल को एक ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार करके पेश करना था, ताकि कोर्ट की कार्यवाही से जुड़े कमर्शियल इस्तेमाल, गलत तरीके से पेश करने, गलत कोट करने और भ्रामक कंटेंट फैलाने जैसी चिंताओं से निपटा जा सके।

    सुनवाई की शुरुआत में, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि मिले हुए सुझाव MeitY को भेज दिए गए हैं और उन्होंने इस मामले को दिवाली की छुट्टियों के बाद सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।

    उन्होंने कोर्ट के पिछले निर्देशों के कुछ उल्लंघनों की ओर भी ध्यान दिलाया और आग्रह किया कि नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कोर्ट ऐसा कंटेंट हटाने का निर्देश दे।

    एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि अगर कोर्ट की कार्यवाही का एक आधिकारिक और प्रमाणित रिपॉजिटरी (जिसमें वॉटरमार्क, क्रिप्टोग्राफिक साइनिंग आदि हों) कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर रखा जाए और लोग केवल वहीं से क्लिप्स ले सकें तो इन समस्याओं को हल किया जा सकता है।

    जस्टिस बागची ने बताया कि प्रशासनिक स्तर पर इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट्स के यूट्यूब चैनलों से क्लिप्स निकालने को रोकने के लिए भी काम चल रहा है।

    हालांकि, जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि इसे लागू करने में अभी भी मुश्किलें आ रही हैं।

    इसके बाद जब जस्टिस बागची ने याद दिलाया कि कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में कोर्टरूम क्लिप्स के किसी भी तरह के कमर्शियल इस्तेमाल पर रोक लगाई तो भूषण ने तर्क दिया कि कमर्शियल इस्तेमाल एक अस्पष्ट शब्द है। उन्होंने एक उदाहरण दिया कि अगर कोई यूट्यूबर किसी केस के बारे में रिपोर्ट करना चाहता है और आधिकारिक वेबसाइट से कार्यवाही का कोई क्लिप इस्तेमाल करता है, तो क्या होगा?

    जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि यूट्यूबर को कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल से अनुमति लेनी होगी।

    SG मेहता ने आगे कहा कि यूट्यूबर अपने पब्लिश किए गए कंटेंट से पैसे कमाते हैं और वे ऐसा किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए नहीं कर रहे हैं।

    इस पर भूषण ने कहा कि ऐसी पूर्व-शर्त से समस्या पैदा हो सकती है। लेकिन जस्टिस बागची ने फिर दोहराया कि क्लिप निकालने और उसे निकालने के उद्देश्य, दोनों ही मामलों में कोर्ट की निगरानी होनी चाहिए।

    जज ने टिप्पणी की,

    "जब हम इस स्थिति में पहुंचेंगे तब हम इस समस्या पर विचार करेंगे।"

    यह देखते हुए कि MeitY (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) इस संबंध में एक नीति बना रहा है, कोर्ट ने आदेश दिया,

    "बताया गया है कि नीति बनाने पर विचार चल रहा है। जो लोग निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए जरूरी उपाय भी इस नीति में शामिल किए जाएंगे।"

    24 जुलाई के अपने आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया था,

    "भारत के सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना, न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या किसी अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निकालना, फैलाना, उससे पैसे कमाना, पोस्ट करना, री-पोस्ट करना, अपलोड करना, प्रसारित करना, उसमें बदलाव करना, स्टोर करना या होस्ट करना मना है।"

    साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश से समाचार आउटलेट्स को कोर्ट की कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जाएगा, बशर्ते वे क्लिप शेयर न करें।

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