शिवसेना मामले में देरी का नतीजा देख चुके हैं: तृणमूल के चुनाव चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ECI से जल्द फैसला लेने को कहा
Amir Ahmad
24 Sept 2026 1:36 PM IST

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर ममता बनर्जी और रितब्रत बनर्जी गुटों के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से जल्द फैसला लेने को कहा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने चुनाव आयोग से पूछा कि वह इस विवाद पर अंतिम फैसला लेने में कितना समय लेगा और आयोग से सुनवाई की समयसीमा बताने को कहा।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ममता बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें चुनाव आयोग के 17 सितंबर के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई। आयोग ने दोनों गुटों के बीच विवाद के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस यानी AITC के मूल नाम और 'फूल और घास' चुनाव चिन्ह को फिलहाल फ्रीज कर दिया था।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने चुनाव आयोग की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू से कहा कि आयोग यह पता करे कि अंतिम फैसला लेने में उसे कितना समय लगेगा। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को उचित अवसर देने और मामले पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, लेकिन प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी नहीं होनी चाहिए।
चीफ जस्टिस ने कहा कि मामले में जल्द फैसला जरूरी है, खासकर इसलिए क्योंकि अंतरिम आदेश में दर्ज तथ्यों के मुताबिक दोनों गुटों के उम्मीदवारों ने आगामी उपचुनावों के लिए तृणमूल कांग्रेस के नाम से नामांकन दाखिल किया।
ममता बनर्जी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने सुनवाई की शुरुआत में सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग उपचुनाव के बीच ऐसा आदेश पारित कर सकता है। उन्होंने कहा कि आयोग ने चुनाव के बीच आदेश पारित किया, जबकि इस समय याचिकाकर्ता के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना मुश्किल हो गया।
सिब्बल ने कहा कि विवाद जुलाई में ही चुनाव आयोग के सामने पहुंच गया और कई महीनों तक मामला लंबित रहा। उनके अनुसार, आयोग यह आदेश चुनाव से काफी पहले भी पारित कर सकता था, जिससे संबंधित पक्ष को कानूनी उपाय का अवसर मिलता।
सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के आदेश का प्रभाव ऐसा है कि याचिकाकर्ता के पास प्रभावी कानूनी उपाय नहीं बचता।
हालांकि, चीफ जस्टिस ने पूछा कि जब दोनों गुट खुद को वास्तविक AITC बताते हुए उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल कर चुके हैं, तब चुनाव आयोग के पास क्या विकल्प है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि चुनाव कार्यक्रम पहले ही अधिसूचित हो चुका है और पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनावों के लिए आयोग द्वारा की गई अंतरिम व्यवस्था को इस स्तर पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस बागची ने कहा कि अब मुख्य सवाल यह है कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को समान स्थिति में रखने के लिए अंतरिम व्यवस्था जरूरी है, इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले चुनाव आयोग ने प्रथमदृष्टया कोई संतोष दर्ज किया, या नहीं।
इस पर सिब्बल ने कहा कि आयोग ने इस पहलू पर कोई विचार ही नहीं किया।
सिब्बल ने हालांकि स्पष्ट किया कि वह मौजूदा उपचुनाव के बीच आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती देने की मांग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अदालत से केवल यह निर्देश देने का आग्रह किया कि चुनाव आयोग अक्टूबर में ही मूल विवाद पर फैसला करे। उन्होंने कहा कि जल्द ही स्थानीय निकाय चुनाव भी होने वाले हैं और उससे पहले स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
दूसरी ओर, रितब्रत बनर्जी गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि चुनाव आयोग इस तरह के अंतरिम आदेश पहले भी ऐसे विवादों में जारी करता रहा है। उन्होंने शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद का भी हवाला दिया।
इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की,
“हमने देखा है कि शिवसेना मामले में देरी का क्या नतीजा होता है।”
रोहतगी ने हालांकि कहा कि अक्टूबर तक की समयसीमा बहुत कम होगी और आयोग को मामले पर विचार करने के लिए थोड़ा और समय दिया जाना चाहिए। रितब्रत गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने कहा कि विवाद में कई जटिल तथ्यात्मक मुद्दे हैं। इसके लिए हलफनामे और साक्ष्य दाखिल करने होंगे और एक महीने की अवधि पर्याप्त नहीं होगी।
ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। चुनाव आयोग और रितब्रत बनर्जी को मामले में प्रतिवादी बनाया गया।
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अपने अंतरिम आदेश में कहा कि उसके सामने दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं। एक गुट का नेतृत्व ममता बनर्जी और दूसरे का रितब्रत बनर्जी कर रहे हैं और दोनों ही खुद को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं।
इसके बाद आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए ममता बनर्जी के गुट को “ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' चुनाव चिन्ह आवंटित किया। रितब्रत बनर्जी के गुट को “डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस” नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह दिया गया।
यह अंतरिम व्यवस्था 6 अक्टूबर को होने वाले पश्चिम बंगाल के आगामी उपचुनावों पर लागू होगी। इनमें नंदीग्राम और रेजीनगर भी शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि नए नाम और चुनाव चिन्हों का आवंटन केवल अंतरिम व्यवस्था है। इससे मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दोनों गुटों के दावों का अंतिम फैसला नहीं हुआ। मूल विवाद पर चुनाव आयोग अलग से चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत फैसला करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई अगले सप्ताह तक टालते हुए चुनाव आयोग से विवाद के अंतिम निपटारे के लिए प्रस्तावित समयसीमा बताने को कहा।

