धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के नियमन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के फैसले का इंतजार करने को कहा
Amir Ahmad
11 May 2026 3:55 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता और निगरानी की मांग वाली याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के निर्णय का इंतजार करने को कहा।
जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय स्वयं अदालत में पेश हुए।
याचिका में दावा किया गया कि देशभर में बड़ी संख्या में गैर-पंजीकृत संस्थान बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के नाम पर कट्टरपंथ की ओर धकेल रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन संस्थानों पर सरकारी निगरानी नहीं होने के कारण राष्ट्रीय एकता, भाईचारे और आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस दिपांकर दत्ता ने कहा कि इसी तरह की एक अन्य याचिका में अदालत पहले ही हस्तक्षेप से इनकार कर चुकी है और याचिकाकर्ता को शिक्षा मंत्रालय के सचिव के समक्ष प्रतिवेदन देने को कहा गया।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 10 फरवरी को अपना प्रतिवेदन दिया और अभी केवल तीन महीने ही हुए हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को फैसला लेने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए।
जब याचिकाकर्ता ने कहा कि अदालत पहले भी ऐसी याचिकाओं पर विचार कर चुकी है, तब जस्टिस दत्ता ने कहा,
“आप ऐसे पीठ के सामने हैं, जिसमें परंपरागत सोच वाले जज हैं। हमें जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा,
“जब आप पहली बार आए थे, तब हमने कहा था कि यदि आप 1974 के फैसले के आधार पर निर्देश चाहते हैं, तो पहले संबंधित प्राधिकरण के पास जाना होगा। अभी बहुत समय भी नहीं बीता है।”
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय केवल एकतरफा जिम्मेदारी नहीं है और कार्यपालिका तथा विधायिका की भी समान जिम्मेदारी है।
याचिकाकर्ता ने आग्रह किया कि वर्तमान याचिका को ही प्रतिवेदन मान लिया जाए, लेकिन अदालत ने कहा कि चूंकि प्रतिवेदन पहले ही दिया जा चुका है, इसलिए पहले उस पर निर्णय होने दिया जाए।
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि धार्मिक शिक्षा देने वाले अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक संस्थानों को संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत विशेष संरक्षण न दिया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि अनुच्छेद 30 केवल धर्मनिरपेक्ष और व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों पर लागू होना चाहिए, न कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों पर।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा किया।

