हर जज जानता है कि 'दिल्ली दंगा साजिश और भीमा कोरेगांव मामलों के आरोप खोखले, अंततः ढह जाएंगे': सीनियर एडवोकेट चंदर उदय सिंह
Amir Ahmad
10 Jun 2026 3:40 PM IST

सीनियर एडवोकेट चंदर उदय सिंह ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत को लेकर हाल के सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों की आलोचना करते हुए कहा कि दिल्ली दंगा साजिश और भीमा कोरेगांव जैसे मामलों में लगाए गए आरोप अंततः टिक नहीं पाएंगे।
लाइव लॉ को दिए एक इंटरव्यू में सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज इन मामलों की वास्तविकता से भली-भांति परिचित हैं।
उन्होंने कहा,
"मैं यह बात स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं। मुझे नहीं लगता कि भारत के सुप्रीम कोर्ट का कोई भी जज दिल पर हाथ रखकर यह कह सकता है कि उसे भीमा कोरेगांव और दिल्ली दंगा मामलों की वास्तविकता पता नहीं है। मुझे नहीं लगता कि कोई जज अपने मन से यह मानता होगा कि आरोपों में रत्तीभर भी सच्चाई है। आरोप चाहे कितने भी गंभीर बताए जाएं वे आखिरकार आरोप ही हैं। हर जज जानता है कि ये आरोप खोखले हैं और अंततः धराशायी हो जाएंगे।"
सिंह ने UAPA के तहत जमानत संबंधी न्यायिक दृष्टिकोण में कथित असंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी हो और आरोपी लंबे समय तक जेल में रहे, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार प्रभावित हों तो संवैधानिक अदालतें वैधानिक प्रतिबंधों के बावजूद जमानत दे सकती हैं।
उनके अनुसार, इस सिद्धांत का बाद के कई मामलों में अनुसरण किया गया लेकिन 2024 के एक फैसले में इससे अलग रुख अपनाया गया।
उन्होंने कहा कि बाद में एक अन्य फैसले में भी इसी दृष्टिकोण को दोहराया गया, जिसमें मुकदमे में देरी को अकेले जमानत का आधार मानने से इनकार किया गया।
सिंह ने कहा,
"कई फैसलों में यह कहा गया कि यदि मुकदमा समय पर पूरा नहीं हो पा रहा है, तो आरोपों की गंभीरता अप्रासंगिक हो जाती है और अनुच्छेद 21 का प्रश्न प्रमुख हो जाता है।"
उन्होंने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि विशेष कानूनों के तहत मामलों में हजारों पन्नों की आरोपपत्र दाखिल कर व्यापक कथानक खड़ा किया जाता है, जिससे जमानत प्राप्त करना बेहद कठिन हो जाता है।
सिंह ने कहा,
"इन मामलों में अब पुलिस पारंपरिक अर्थों में जांच नहीं कर रही है। संदेह के आधार पर गिरफ्तारी होती है और फिर हजारों पन्नों के आरोपपत्रों के जरिए एक कथानक तैयार किया जाता है। इनमें अक्सर ऐसा ठोस साक्ष्य नहीं होता, जो सीधे किसी व्यक्ति को अपराध से जोड़ सके।"
उन्होंने उन मामलों का भी उल्लेख किया, जिनमें आरोपियों को जमानत याचिका दोबारा दायर करने के लिए एक वर्ष तक प्रतीक्षा करने को कहा गया। इस पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यदि मुकदमे की शुरुआत तक नहीं हुई है और निकट भविष्य में उसके पूरा होने की संभावना भी नहीं है, तो यह समझना कठिन है कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन एक वर्ष बाद माना जाएगा, अभी क्यों नहीं।
दिल्ली दंगा साजिश और भीमा कोरेगांव मामलों का उल्लेख करते हुए सिंह ने फिर दोहराया कि अदालतें इन मामलों की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ नहीं हैं।
उन्होंने कहा,
"गंभीर आरोपों का आवरण चढ़ाया जा सकता है, लेकिन अंततः हर कोई जानता है कि इन आरोपों की वास्तविकता क्या है।"
साक्षात्कार के दौरान सिंह ने दिल्ली आबकारी नीति मामले का भी उल्लेख किया और दावा किया कि सुनवाई के दौरान एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने टिप्पणी की थी कि जिरह के दौरान कुछ प्रश्न ही अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि बाद में आरोपियों को राहत मिलने से यह चिंता और गहरी होती है कि लंबी अवधि तक कारावास झेलने वाले कई अभियुक्त अंततः मुकदमे में दोषमुक्त भी हो सकते हैं।
सिंह की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब UAPA के तहत जमानत, लंबी कैद और मुकदमों में देरी को लेकर न्यायिक विमर्श लगातार जारी है।

