जमानत देने पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- चेतावनी देना पर्याप्त होता

  • जमानत देने पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- चेतावनी देना पर्याप्त होता

    सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के रिटायर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जमानत देने के मामले में शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही रद्द की।

    बता दें, अधिकारी ने दो आरोपियों को उस समय जमानत दी थी, जब उनकी पिछली जमानत याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट खारिज कर चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में अनुशासनात्मक जांच शुरू करने की जरूरत नहीं थी। अधिकारी को भविष्य में सावधानी बरतने की सलाह देना या चेतावनी देना पर्याप्त होता।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने राजस्थान सरकार और हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि अधिकारी के वेतन की गणना संशोधित वेतनमान के अनुसार की जाए और तीन महीने के भीतर उनकी पेंशन सहित सभी रिटायरमेंट लाभ तथा बकाया राशि जारी की जाए। यह निर्देश किसी अन्य कानूनी बाधा के अधीन रहेगा।

    मामला मुकेश त्यागी से जुड़ा है, जो धौलपुर में POCSO Act के तहत विशेष जज के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने मई 2019 में दो आरोपियों को जमानत दी थी। इससे पहले आरोपियों की जमानत याचिकाएं हाईकोर्ट खारिज कर चुका था।

    बाद में हाईकोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए कहा कि पिछली अर्जियों के खारिज होने के बाद परिस्थितियों में ऐसा कोई बदलाव नहीं हुआ, जिसके आधार पर आरोपियों को राहत दी जा सके।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश को चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया। इसके बाद मुकेश त्यागी के खिलाफ राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 16 के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई। उन पर गंभीर न्यायिक अनुचित आचरण और अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अनुशासनात्मक जांच जरूरी नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उन टिप्पणियों में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जो जमानत आदेश को लेकर की गई थीं। हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि इन टिप्पणियों के आधार पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करना उचित नहीं था।

    अदालत ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जांच शुरू करने की आवश्यकता नहीं थी। इसके बजाय हाईकोर्ट के संबंधित जज की टिप्पणियों को अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में दर्ज करना पर्याप्त हो सकता था। अधिकारी को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने और विशेष रूप से उसी मामले में हाईकोर्ट के पहले के आदेशों को पर्याप्त महत्व देने की सलाह देकर चेतावनी दी जा सकती थी।

    बेंच ने माना कि 25 अक्टूबर 2024 को जारी अनुशासनात्मक ज्ञापन, नियम 16 के तहत आरोप-पत्र और उससे संबंधित आरोप इस मामले में जरूरी नहीं थे। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुशासनात्मक ज्ञापन और उससे जुड़ी पूरी आरोप प्रक्रिया रद्द की।

    सकारात्मक गोपनीय रिपोर्ट और रिटायरमेंट लाभों का भी उल्लेख

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मुकेश त्यागी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट सकारात्मक थी। वह 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन संशोधित वेतनमान के अनुसार उनका वेतन और रिटायरमेंट लाभ अब तक जारी नहीं किए गए।

    अदालत ने राजस्थान सरकार और हाईकोर्ट को तीन महीने के भीतर संशोधित वेतन की गणना कर पेंशन, बकाया और अन्य रिटायरमेंट लाभ जारी करने का निर्देश दिया।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला मामले की विशिष्ट परिस्थितियों तक सीमित है। इस निर्णय को हर ऐसे मामले पर लागू नहीं माना जा सकता, जिसमें किसी न्यायिक अधिकारी के जमानत आदेश पर सवाल उठाया गया हो।

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