सरकार विरोधी और 'न्यायपालिका विरोधी' सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की मांग वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

  • सरकार विरोधी और न्यायपालिका विरोधी सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की मांग वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

    सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर 'सरकार विरोधी' और 'न्यायपालिका विरोधी' भावनाएं भड़काने वाली पोस्ट को हटाने या ब्लॉक करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत रखने की स्वतंत्रता दी।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की।

    सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट डालने वालों को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों के समक्ष इस मुद्दे को उठा सकता है।

    यह जनहित याचिका एक सामाजिक कार्यकर्ता ने दायर की थी। याचिका में फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, यूट्यूब समेत विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर कथित तौर पर 'राष्ट्र विरोधी नारे और भाषण/बयान' प्रसारित किए जाने पर आपत्ति जताई गई।

    याचिकाकर्ता का आरोप था कि सोशल मीडिया पर प्रेरित बयानों के जरिए 'सरकार विरोधी और न्यायपालिका विरोधी भावनाएं' फैलाए जाने के बावजूद सोशल मीडिया कंपनियां सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और संबंधित नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई नहीं कर रही हैं।

    याचिका में केंद्र सरकार को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय के माध्यम से, दिल्ली सरकार और गूगल, मेटा प्लेटफॉर्म्स, एक्स कॉर्प तथा व्हाट्सऐप को पक्षकार बनाया गया।

    याचिका में कथित अवैध डिजिटल सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई। इसमें मीम, बदली या छेड़छाड़ की गई सामग्री और कथित आपत्तिजनक पोस्ट शामिल थीं, जिनके बारे में याचिकाकर्ता का आरोप है कि उनका उद्देश्य हिंदू धार्मिक मान्यताओं, सनातन धर्म और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति अपमान या घृणा को बढ़ावा देना है।

    याचिकाकर्ता ने दावा किया कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान कुछ नारे, बयान और भाषण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को पार करते हैं और किसी विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। उसके अनुसार, ऐसी सामग्री सोशल मीडिया पर अपलोड होने के बाद बड़े पैमाने पर फैलती है और इससे सांप्रदायिक तनाव की आशंका बढ़ती है।

    याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सेल्फी वीडियो को फेसबुक से हटाए जाने की घटना का भी उदाहरण दिया गया। यह वीडियो कथित तौर पर नीट प्रश्नपत्र लीक से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के दौरान अपलोड किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, मेटा ने बाद में वीडियो हटाए जाने को एक गलती बताया और इसके लिए माफी मांगी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मामला केवल माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सोशल मीडिया मंचों द्वारा नियमों के पालन पर भी सवाल उठता है।

    याचिका में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ सोशल मीडिया के जरिए आपत्तिजनक सामग्री फैलाने वालों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण नहीं मिल सकता।

    याचिकाकर्ता ने रणवीर इलाहाबादिया से जुड़े 'इंडियाज गॉट लैटेंट' विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी हवाला दिया। उस मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए प्रस्ताव तैयार करने को कहा था।

    याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि प्रभावी नियामक ढांचा तैयार होने तक सोशल मीडिया पर संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ कथित हमलों को रोकने के लिए अदालत दिशा-निर्देश जारी करे।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर मांगी गई राहत देने से इनकार करते हुए इसे खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत रखने की स्वतंत्रता दी।

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