2000 लाल किला हमला: लश्कर आतंकी की क्यूरेटिव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

Amir Ahmad

22 Jan 2026 1:16 PM IST

  • 2000 लाल किला हमला: लश्कर आतंकी की क्यूरेटिव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वर्ष 2000 के लाल किला आतंकी हमले के मामले में मौत की सजा पाए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिका पर नोटिस जारी किया।

    यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2022 के उस फैसले को चुनौती देती है, जिसमें उसकी मौत की सजा बरकरार रखते हुए पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई थी।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जे.के. महेश्वरी की पीठ ने क्यूरेटिव याचिका पर नोटिस जारी किया।

    नवंबर, 2022 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो आतंकी कृत्य भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देते हैं, वे सबसे गंभीर श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों में कोई भी रियायती परिस्थितियां महत्व नहीं रखतीं।

    यह मामला 22 दिसंबर, 2000 का है, जब दिल्ली स्थित लाल किले में आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में 7वीं राजपूताना राइफल्स के तीन जवान शहीद हो गए।

    पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद आरिफ को 25 दिसंबर, 2000 को गिरफ्तार किया गया। ट्रायल कोर्ट ने 24 अक्टूबर, 2005 को उसे दोषी ठहराया और 31 अक्टूबर 2005 को मौत की सजा सुनाई। दिल्ली हाइकोर्ट ने 13 सितंबर, 2007 को इस सजा की पुष्टि की थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने 10 अगस्त, 2011 को आरिफ की अपील खारिज कर दी थी, जबकि 28 अगस्त 2011 को उसकी पुनर्विचार याचिका भी नामंजूर कर दी गई। उस समय कोर्ट ने कहा था कि यह हमला सीधे तौर पर राष्ट्र के खिलाफ था, आरोपी एक विदेशी नागरिक था जो अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ और पूरी साजिश भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने तथा भारतीय सेना के जवानों की हत्या से जुड़ी थी। कोर्ट ने माना था कि ऐसे मामले में मौत की सजा ही उचित दंड है।

    हालांकि, 28 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने आरिफ की फांसी पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2016 में संविधान पीठ के एक फैसले के बाद जिसमें कहा गया कि मौत की सजा से जुड़े मामलों में पुनर्विचार याचिकाएं खुली अदालत में सुनी जाएंगी, सुप्रीम कोर्ट ने आरिफ की समीक्षा याचिका पर दोबारा सुनवाई का फैसला किया।

    समीक्षा कार्यवाही के दौरान आरिफ ने कई आधार उठाए। उसने दलील दी कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड को बिना भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र के साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया, जो गलत है।

    उसने यह भी आरोप लगाया कि उसकी कथित स्वीकारोक्ति अवैध हिरासत और दुर्व्यवहार के कारण अमान्य है तथा बाटला हाउस मुठभेड़ और गोला-बारूद की बरामदगी को उससे नहीं जोड़ा जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के मुद्दे पर कहा था कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ धारा 65बी(4) का प्रमाणपत्र अनिवार्य है, जब तक कि मूल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्रस्तुत न किया जाए।

    कोर्ट ने माना कि प्रमाणपत्र के अभाव में कॉल डिटेल रिकॉर्ड को साक्ष्य से बाहर करना होगा।

    हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड को अलग करने के बावजूद, रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्य आरिफ की संलिप्तता को संदेह से परे साबित करते हैं।

    सजा के प्रश्न पर कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी थी कि आरोपी के सुधार या पुनर्वास की संभावना पर विचार नहीं किया गया।

    कोर्ट ने कहा कि आरिफ के पक्ष में कोई भी रियायती परिस्थिति सामने नहीं आती और राष्ट्र की संप्रभुता पर सीधा हमला करने जैसे गंभीर कारक सभी रियायती पहलुओं पर भारी पड़ते हैं।

    अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्यूरेटिव याचिका पर नोटिस जारी किए जाने के बाद इस मामले में आगे सुनवाई होगी।

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