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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा : एनडीपीएस की धारा 50 केवल निजी तलाशी के मामले में लागू

LiveLaw News Network
16 Sep 2020 8:26 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा : एनडीपीएस की धारा 50 केवल निजी तलाशी के मामले में लागू
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सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के एक पुजारी को दोषी ठहराते हुए एक बार फिर कहा है कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस) की धारा 50 केवल निजी तलाशी के मामले में लागू होती है।

अभियुक्त ने इस मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 के प्रावधानों पर अमल न किए जाने का मुद्दा उठाया था। अभियुक्त के अनुसार, नमूने एक अधिकारी को सौंपे गए थे, जिसने या तो खुद ही दूसरे अधिकारी को नमूने दिए या खुद दिल्ली स्थित सेंट्रल लैबोरेट्री तक लेकर पहुंचाया तथा इसका प्रमाण निदेशक के पास था। ऐसी स्थिति में नमूने के साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इतना ही नहीं अभियुक्त ने अभियोजन का पक्ष अस्वाभाविक और अमान्य भी बताया था। ट्रायल कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए अभियुक्त को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने बाद में ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्त को बरी करने के फैसले को पलट दिया था और उसे दोषी ठहराया था।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की बेंच ने हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम पवन कुमार के मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया, जिसमें इस बात पर विचार किया गया था कि क्या किसी व्यक्ति की तलाशी के संबंध में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 की धारा 50 में उपलब्ध बचाव किसी बैग, ब्रीफकेस या किसी समान अथवा कंटेनर आदि पर भी लागू होगा, जो उस व्यक्ति द्वारा ले जाया जा रहा है।

बेंच ने कहा :

''हाईकोर्ट ने सही ही कहा है, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम पवन कुमार के मामले में व्यवस्था दी है कि एनडीपीएस की धारा 50 केवल निजी तलाशी के मामले में ही लागू होती है। ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट के इस तथ्य का कोई आधार नहीं है कि इस मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।''

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्यों से यह पूरी तरह स्थापित होता है कि मंदिर के बगल में पुजारी की पत्नी के नाम पर पंजीकृत जमीन पर बनाए गए ढाबा के काउंटर में रखे गए टाट के थैले से चरस बरामद किया गया था। कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले के तथ्यों से यह भी पता चलता है कि अभियुक्त का न केवल चरस पर प्रत्यक्ष व्यक्तिगत नियंत्रण था, बल्कि उसे चरस की मौजूदगी के बारे में पूरी जानकारी भी थी।

हालांकि इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह घटना 2001 में हुई थी और अभियुक्त का दावा है कि वह मंदिर का पुजारी है, जिसकी उम्र करीब 65 साल है, बेंच ने 15 साल के सश्रम कारावास की सजा कम करके 10 साल कर दी।

'हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम पवन कुमार' के मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 के प्रावधान तब लागू नहीं होगा, जब अभियुक्त द्वारा लिये गए थैले से कथित तौर पर प्रतिबंधित पदार्थ बरामद किया गया हो।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा था, ''इस प्रावधान में इस्तेमाल शब्द ' व्यक्ति' को विस्तारित अर्थ देना वांछित या न्यायोचित नहीं है, ताकि उसमें अभियुक्त द्वारा ले जाए जाने वाले कुछ बैग, सामान या कंटेनर या अन्य सामान को भी उसके दायरे में शामिल किया जा सके।''

केस नंबर : क्रिमिनल अपील नंबर 668/2013

केस का नाम : जीत राम बनाम नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, चंडीगढ़

कोरम : न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह

वकील: एडवोकेट पुरुषोत्तम शर्मा त्रिपाठी आईएएसजी अमन लेखी

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