मां के पैर छूकर अपने पापों के लिए माफी मांगो': संपत्ति विवाद में जस्टिस एससी शर्मा ने बेटे से कहा
Amir Ahmad
9 Sept 2026 3:21 PM IST

मां और बेटे के बीच संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को मां के प्रति अपने कर्तव्य और हिंदू धर्म में मां के महत्व की याद दिलाई।
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने बेटे से मौखिक रूप से कहा कि वह अपनी मां के पैर छूकर माफी मांगे और उनका आशीर्वाद ले।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने बेटे की याचिका खारिज करते हुए कहा,
“आपको अपनी मां के पास जाकर उनके पैर छूने चाहिए और माफी मांगनी चाहिए। अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगिए।”
जस्टिस शर्मा ने अदालत में मौजूद वकीलों से भी कहा कि क्या बेटे का अपनी मां के साथ इस तरह व्यवहार करना गलत नहीं है।
उन्होंने कहा कि अदालत बेटे से यही कह रही है कि वह अपनी मां के पास वापस जाए, उन्हें छुए, अपनी गलती महसूस करे, माफी मांगे और उनका आशीर्वाद ले।
मामला एक संपत्ति को लेकर मां-बाप और उनके बेटे के बीच विवाद से जुड़ा था। मां और उनके पति संपत्ति के एकमात्र मालिक थे। उन्होंने प्रेम और स्नेह के कारण बेटे और उसकी पत्नी को संपत्ति की पहली मंजिल पर बिना किराए के रहने की अनुमति दी थी। दोनों वहां बतौर लाइसेंसी रह रहे थे।
माता-पिता का आरोप है कि बाद में बेटे और उसकी पत्नी ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया और संपत्ति अपने नाम करने के लिए दबाव बनाया। आरोप यह भी है कि दोनों ने कथित रूप से जाली दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया।
इसके बाद माता-पिता ने अखबार में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कर बेटे और बहू से संबंध खत्म करने की घोषणा की।
उन्होंने बेटे के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई और नोटिस के जरिए उसे और उसकी पत्नी को दी गई रहने की अनुमति समाप्त की। साथ ही दोनों को संपत्ति खाली करने के लिए कहा गया।
इसके बाद माता-पिता ने संपत्ति पर कब्जा वापस पाने, स्थायी रोक और हर्जाने की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया।
निचली अदालत ने माता-पिता के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि वे संपत्ति के एकमात्र मालिक हैं और बेटा तथा उसकी पत्नी केवल लाइसेंसी के तौर पर वहां रह रहे थे। उनकी लाइसेंस समाप्त किए जाने के बाद दोनों के पास संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने उन्हें पहली मंजिल खाली करने का निर्देश दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 17 अप्रैल को निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।
इसके बाद बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और याचिका खारिज की।
याचिका खारिज होने के साथ ही निचली अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट के वे आदेश बरकरार रहे, जिनमें बेटे और उसकी पत्नी को माता-पिता की संपत्ति की पहली मंजिल खाली करने को कहा गया।


