जब देश में जन्म दर घट रही है तो दो बच्चों की शर्त क्यों?: स्थानीय निकाय चुनावों पर लगे प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल

Amir Ahmad

15 July 2026 1:18 PM IST

  • जब देश में जन्म दर घट रही है तो दो बच्चों की शर्त क्यों?: स्थानीय निकाय चुनावों पर लगे प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल

    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों को पंचायत और अन्य स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि देश में लगातार घटती जन्म दर के बीच ऐसे कानूनों की आवश्यकता और वैधता पर नए सिरे से विचार किए जाने की जरूरत है।

    जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(जे-1) से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इस प्रावधान के तहत 13 सितंबर, 2000 के बाद तीसरी संतान होने पर व्यक्ति को ग्राम पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है।

    मामला काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता से जुड़ा है, जिन्हें तीसरी संतान के जन्म के बाद पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा ने मौखिक रूप से कहा कि हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 में दो बच्चों की शर्त को सही ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2003 के फैसले पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।

    कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां जन्म दर लगातार घट रही है, यह विचार करना जरूरी है कि क्या ऐसे कानून आज भी उचित और संवैधानिक हैं।

    खंडपीठ ने इस व्यापक मुद्दे पर विचार करने की इच्छा जताते हुए महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील रुक्मिणी बोबड़े को एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया। उन्हें उन सात राज्यों के कानूनों का अध्ययन करने को कहा गया, जहां स्थानीय निकाय चुनावों में दो बच्चों की शर्त लागू है।

    साथ ही, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रतीक बोंबार्डे को भी इस विषय पर शोध कर विस्तृत दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

    जस्टिस नरसिम्हा ने एमिक्स क्यूरी से भारत में घटती जन्म दर पर प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के लेख का भी अध्ययन करने को कहा।

    मामले के अनुसार, मंगला भीमराव के खिलाफ अतिरिक्त कलेक्टर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके बाद उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। अतिरिक्त आयुक्त ने भी उनका पक्ष खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया।

    5 अगस्त, 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी तीसरी संतान के जन्म प्रमाणपत्र से खुद को अलग दिखाने की कोशिश की, लेकिन उस दस्तावेज में माता-पिता दोनों के नाम दर्ज हैं और इसके विपरीत कोई ठोस साक्ष्य भी नहीं है। इसलिए हाईकोर्ट ने उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा।

    इसके सके खिलाफ मंगला भीमराव ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर, 2025 को हाईकोर्ट के आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगाई थी। अब कोर्ट इस मुद्दे के व्यापक संवैधानिक पहलुओं पर विचार करेगा।

    Next Story