सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका से सुप्रीम कोर्ट के तीसरे जज भी हुए अलग, दूसरी पीठ के समक्ष होगी सुनवाई

Amir Ahmad

21 July 2026 12:47 PM IST

  • सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका से सुप्रीम कोर्ट के तीसरे जज भी हुए अलग, दूसरी पीठ के समक्ष होगी सुनवाई

    वर्ष 2016 के गढ़चिरौली आगजनी मामले में वकील एवं सोशल एक्टिविस्ट सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट के तीसरे जस्टिस ने भी स्वयं को अलग कर लिया है। अब इस मामले की सुनवाई दूसरी पीठ के समक्ष होगी।

    मामला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था। सुनवाई शुरू होते ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने मामले को कुछ समय बाद लेने का अनुरोध किया।

    इस पर जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि मामला अब दूसरी पीठ के समक्ष जाएगा क्योंकि जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने इससे अलग होने का निर्णय लिया।

    उन्होंने कहा,

    "मामला किसी दूसरी पीठ के समक्ष रखा जाए, जिसमें हम दोनों में से कोई एक सदस्य न हो।"

    यह इस मामले में तीसरा अवसर है जब सुप्रीम कोर्ट के किसी जस्टिस ने सुनवाई से स्वयं को अलग किया है। इससे पहले जस्टिस अतुल चांदूरकर और जस्टिस एम. एम. सुंदरेश भी इस मामले की सुनवाई से अलग हो चुके हैं।

    सुरेंद्र गाडलिंग ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें गढ़चिरौली आगजनी मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

    बता दें, गाडलिंग जून 2018 से भीमा-कोरेगांव मामले में भी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून के तहत न्यायिक हिरासत में हैं।

    गढ़चिरौली मामले में उन पर आरोप है कि उन्होंने माओवादी साजिश के तहत महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के सुरजागढ़ खदानों से लौह अयस्क ले जा रहे 80 से अधिक वाहनों में आग लगाने की साजिश में भूमिका निभाई और अन्य आरोपियों को ऐसा करने के निर्देश दिए।

    पिछले वर्ष सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के विचारण में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताई थी।

    अदालत ने सवाल किया था कि क्या किसी व्यक्ति को मुकदमा पूरा हुए बिना वर्षों तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रखा जा सकता है।

    अदालत ने राज्य सरकार से मुकदमे में देरी के कारण, आरोपमुक्ति संबंधी आवेदनों के लंबित रहने की वजह, अभियोजन की सुनवाई की योजना तथा मुकदमा पूरा होने की संभावित समय-सीमा जैसी जानकारियां भी मांगी थीं।

    गाडलिंग की ओर से सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर ने अदालत को बताया कि मामले का मुख्य साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक है, जो भीमा-कोरेगांव मामले से भी जुड़ा हुआ है, लेकिन उसकी प्रतियां अभी तक उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि गाडलिंग पिछले सात वर्षों से बिना मुकदमा पूरा हुए जेल में हैं।

    Next Story