POCSO की उपधारा का उल्लेख न होने से दोषसिद्धि अमान्य नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल की सजा बरकरार रखी
Amir Ahmad
25 July 2026 2:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विचारण अदालत या हाईकोर्ट अपने फैसले में पॉक्सो अधिनियम की किसी विशेष उपधारा का स्पष्ट उल्लेख नहीं करती तो केवल इसी आधार पर दोषसिद्धि या सजा अवैध नहीं हो जाती।
अदालत ने कहा कि यदि मामले के तथ्य संबंधित प्रावधान को स्पष्ट रूप से लागू करते हैं, तो उपधारा का उल्लेख न होना दोषसिद्धि को प्रभावित नहीं करता।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने दोषी की याचिका खारिज करते हुए उसके खिलाफ POCSO Act के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उसकी सजा में आंशिक संशोधन करते हुए उसे 20 वर्ष के कठोर कारावास तक सीमित कर दिया।
मामले में दोषी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि विचारण अदालत और बाद में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में POCSO Act की धारा 4(2) का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, इसलिए उसकी सजा कानूनन टिकाऊ नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब यह निर्विवाद रूप से साबित हो गया कि पीड़िता की आयु 16 वर्ष से कम थी, तब इस मामले में स्वाभाविक रूप से POCSO Act की धारा 4(2) ही लागू होती है।
पीठ ने कहा,
"जब यह स्थापित हो गया कि पीड़िता की आयु 16 वर्ष से कम थी तब अपीलकर्ता को केवल POCSO Act की धारा 4 की उपधारा (2) के तहत ही दोषी ठहराया और दंडित किया जा सकता था। इसलिए धारा 4 की विशेष उपधारा का उल्लेख न होने मात्र से ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का सजा संबंधी आदेश अवैध या दोषपूर्ण नहीं हो जाता।"
हालांकि दोषी ने यह भी आग्रह किया कि उसकी सजा कम की जाए, क्योंकि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जेल में उसके खराब आचरण का भी कोई रिकॉर्ड नहीं है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की और उसकी सजा में संशोधन करते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा निर्धारित की।
उल्लेखनीय है कि POCSO Act की धारा 4(2) के तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे के साथ लैंगिक उत्पीड़न के अपराध में न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।


