सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या मामले में IAS अधिकारी टालो पोटम की जमानत रद्द करने पर लगाई रोक
Amir Ahmad
2 Feb 2026 5:15 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई, जिसमें 19 साल के गोमचू येकर की आत्महत्या के मामले में अरुणाचल प्रदेश के IAS अधिकारी टालो पोटम को दी गई जमानत रद्द कर दी गई थी।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा (टालो पोटम के लिए) की बात सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। इसने निर्देश दिया कि पोटम जांच में सहयोग करेंगे।
संक्षेप में यह मामला 19 साल के गोमचू येकर की दुखद मौत से जुड़ा है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 23.10.2025 को लेखी गांव में अपने किराए के घर में आत्महत्या कर ली थी। दावों के अनुसार मृतक ने सुसाइड नोट छोड़े थे, जिसमें आरोपी व्यक्तियों द्वारा व्यवस्थित मानसिक उत्पीड़न, यौन शोषण, भ्रष्टाचार से संबंधित गतिविधियों और HIV/AIDS के संपर्क में आने का खुलासा किया गया।
टालो पोटम को 27.10.2025 को गिरफ्तार किया गया और गिरफ्तारी के 7 दिनों के भीतर सेशंस कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया था। 4 नवंबर के जमानत आदेश को मृतक के पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने पोटम की जमानत रद्द की और आदेश दिया कि उन्हें तुरंत हिरासत में लिया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा,
"मौजूदा मामले में इस कोर्ट की राय है कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की आगे की हिरासत के लिए ज़रूरी प्रासंगिक सामग्रियों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया और बिना सोचे-समझे जमानत दे दी। जांच के इतने शुरुआती चरण में प्रतिवादी नंबर 2/आरोपी जैसे प्रभावशाली व्यक्ति की रिहाई जब उसके खिलाफ स्पष्ट प्रथम दृष्टया मामला था तो पूरी जांच प्रक्रिया पटरी से उतर जाती।"
खास बात यह है कि ट्रायल कोर्ट में कार्यवाही के दौरान अभियोजन पक्ष ने बताया कि आरोपी और मृतक के बीच आदान-प्रदान की गई व्हाट्सएप चैट और वॉयस मैसेज आरोपी ने डिलीट कर दिए। इसलिए संबंधित हैंडसेट विश्लेषण के लिए FSL को भेजे गए और परिणाम प्रतीक्षित थे। यह भी बताया गया कि कानून और व्यवस्था की समस्याओं के कारण आरोपी पुलिस हिरासत में नहीं आया और उसे सीधे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
जमानत आदेश की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के गुण-दोष में जाकर और एक मिनी ट्रायल करके गलती की। कोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट इस बात को हल्के में खारिज नहीं कर सकता था कि पोटम का नाम सुसाइड नोट में था जो उसके खिलाफ शुरुआती तौर पर अहम सबूत था।
इससे परेशान होकर पोटम सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

