आखिर इलाहाबाद हाईकोर्ट को क्या हो गया है?: दहेज मृत्यु मामले में दी गई जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की

Amir Ahmad

30 April 2026 3:02 PM IST

  • आखिर इलाहाबाद हाईकोर्ट को क्या हो गया है?: दहेज मृत्यु मामले में दी गई जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की

    सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु के मामले में आरोपी पति को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द करते हुए कड़ी नाराज़गी जताई।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “आखिर इलाहाबाद हाईकोर्ट को क्या हो गया है? जिन मामलों में जमानत नहीं दी जानी चाहिए उनमें जमानत दी जा रही है।”

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ मृतका के पिता द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी पति को दी गई जमानत को चुनौती दी गई।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अवलोकन किया, जिसमें मृतका की गर्दन के आसपास चोटों के निशान दर्ज थे। इस पर अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह गंभीर मामला है और पत्नी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई है।

    जस्टिस पारदीवाला ने कहा,

    “ऐसे आरोपों और विवाह के सात वर्ष के भीतर हुई मृत्यु की स्थिति में जमानत क्यों दी जाए? आपकी पत्नी आपके घर में संदिग्ध परिस्थिति में मृत पाई गई शरीर पर बाहरी चोटें हैं। आप उसकी मृत्यु की व्याख्या कैसे करेंगे?”

    राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी 18 महीने से हिरासत में है। इस पर अदालत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह हत्या जैसे गंभीर आरोपों वाला मामला है और मात्र हिरासत की अवधि के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृतका का विवाह फरवरी 2019 में हुआ था और उसकी अस्वाभाविक मृत्यु जुलाई 2024 में हुई अर्थात विवाह के सात वर्ष के भीतर। ऐसे मामलों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-बी के तहत दहेज मृत्यु की वैधानिक धारणा लागू होती है, जिसे हाईकोर्ट को ध्यान में रखना चाहिए था।

    अदालत ने यह भी नोट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका के शरीर पर मृत्यु-पूर्व चोटों का उल्लेख है।

    इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जमानत आदेश कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है और उसे रद्द किया जाना चाहिए।

    पीठ ने आरोपी को एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया गया कि मुकदमे का निस्तारण एक वर्ष के भीतर करने का प्रयास किया जाए।

    उल्लेखनीय है कि हाल के समय में सुप्रीम कोर्ट विभिन्न मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ आदेशों पर सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त कर चुका है।

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