कई पुजारी मंदिरों की संपत्तियां बर्बाद कर रहे हैं: निजी मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
Amir Ahmad
20 July 2026 5:21 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 237 वंशानुगत पुजारियों एवं निजी मंदिरों के मालिकों की याचिका पर केंद्र सरकार और तीनों राज्यों को नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि निजी भूमि पर बने उनके मंदिरों की संपत्तियों की सरकारी स्तर पर नीलामी की जा रही है और जिला कलेक्टरों को मंदिरों का प्रबंधक बना दिया गया।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार तथा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संबंधित मंदिर उनके पूर्वजों द्वारा निजी भूमि पर स्थापित किए गए और हमेशा से निजी मंदिर रहे हैं। इसके बावजूद वर्ष 1974 के एक शासनादेश के आधार पर जिला कलेक्टरों को इन मंदिरों का प्रबंधक बना दिया गया और अब मंदिरों की जमीन की नीलामी की कोशिश की जा रही है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने सवाल किया कि यदि वर्ष 1974 के शासनादेश के आधार पर जिला कलेक्टरों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किए गए, तो याचिकाकर्ता पिछले लगभग 60 वर्षों से क्या कर रहे थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि कलेक्टरों के नाम पहले दर्ज किए गए, लेकिन अब प्रशासन मंदिर की जमीन की नीलामी की कार्रवाई कर रहा है।
इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा,
"आप जानते हैं, कई पुजारी मंदिरों की संपत्तियां बर्बाद कर रहे हैं। ऐसे अनेक मामले हमारे सामने आते हैं। वास्तव में यह संपत्ति देवता की होती है।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया इस मामले में याचिकाकर्ताओं के लिए उचित उपाय दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाना हो सकता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने अपने मथुरा दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि लगभग 22 वर्ष पहले जब वह वहां गए, तब मंदिर की स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन हाल में दोबारा जाने पर उन्होंने देखा कि सरकारी प्रबंधन के बाद मंदिर का रखरखाव काफी बेहतर हो गया।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया कि एक स्वतंत्र प्राधिकरण या अधिकरण गठित किया जाए, जो यह तय करे कि संबंधित मंदिर निजी हैं या सार्वजनिक। साथ ही वर्ष 1974 के शासनादेश सहित उन सभी आदेशों और राजस्व अभिलेखों को रद्द करने की मांग की गई, जिनमें जिला कलेक्टर को मंदिरों का प्रबंधक दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की कि राजस्व अभिलेखों में देवता के साथ उनके नाम वंशानुगत पुजारी और मालिक के रूप में बहाल किए जाएं। इसके अलावा, मंदिर की संपत्तियों की नीलामी, ध्वस्तीकरण या किसी भी प्रकार की दखलअंदाजी पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई।


