संविधान केवल औपचारिक समानता नहीं, असमानता की जड़ों को खत्म करने का आह्वान करता है: पूर्व CJI बी.आर. गवई
Amir Ahmad
18 April 2026 12:49 PM IST

हैदराबाद स्थित नालसर लॉ यूनिवर्सिटी में आयोजित डॉ. आंबेडकर स्मृति व्याख्यान में पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई ने कहा कि भारतीय संविधान समानता को केवल कागज़ी अधिकार के रूप में नहीं देखता बल्कि समाज में मौजूद असमानता पैदा करने वाली संरचनाओं को समाप्त करने की जिम्मेदारी भी तय करता है।
जस्टिस गवई ने अपने व्याख्यान में कहा,
“संविधान केवल औपचारिक समानता की बात नहीं करता बल्कि यह मांग करता है कि हम उन ढांचों को पहचानें और खत्म करें, जो असमानता पैदा करते हैं।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक समानता (सार्थक समानता) का अर्थ है कि समाज में मौजूद असमान शुरुआती स्थितियों को समझा जाए और जो वर्ग ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, उनके लिए विशेष कदम उठाए जाएं। उनके अनुसार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संस्थागत सहायता तक पहुंच में जो अंतर दिखाई देता है, वह किसी एक घटना का परिणाम नहीं बल्कि दीर्घकालिक व्यवस्था का हिस्सा है।
जस्टिस गवई ने विकास की मौजूदा प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विकास का असली बोझ अक्सर समाज के सबसे कमजोर वर्गों को उठाना पड़ता है। महाराष्ट्र में गन्ना काटने वाली महिलाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कई महिलाओं ने कम उम्र में ही गर्भाशय हटवाया, जो किसी मेडिकल आवश्यकता के कारण नहीं बल्कि श्रम व्यवस्था के दबाव के चलते हुआ।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय, किसान और श्रमिक वर्ग प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर झेलते हैं।
उन्होंने कहा,
“जब तापमान 48 डिग्री तक पहुंचता है तब सुविधा संपन्न लोग एसी का सहारा लेते हैं, लेकिन मजदूरों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं होता।"
जस्टिस गवई ने इस बात पर जोर दिया कि सतत विकास को संविधान के दृष्टिकोण से देखना जरूरी है। उनके अनुसार यदि विकास से असमानता बढ़ती है या कमजोर वर्गों पर ज्यादा बोझ पड़ता है-तो उसे वास्तविक विकास नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने शासन व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि एक जैसी नीति सब पर लागू करने का तरीका उचित नहीं है, क्योंकि अलग-अलग वर्गों की परिस्थितियां अलग होती हैं। उन्होंने शहरी जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन मजदूरों के श्रम से शहर चलते हैं उन्हें ही रहने की बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
यूनिवर्सिटी की भूमिका पर बोलते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को संविधान के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने का केंद्र बनना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में काम करने वाले संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को भी मूलभूत सुविधाएं, स्वास्थ्य सुरक्षा और उनके बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि समाज में मौजूद जाति, वर्ग, लिंग और भौगोलिक असमानताओं को भविष्य में दोहराया नहीं जाना चाहिए, बल्कि विकास की प्रक्रिया को ऐसा बनाया जाना चाहिए जो इन असमानताओं को खत्म करने में मदद करे।

