दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत, SC/ST मामले में दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

  • दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत, SC/ST मामले में दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के ACP विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार को राहत देते हुए उसके खिलाफ दर्ज SC/ST Act के मामले में अंतरिम संरक्षण प्रदान किया।

    यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुई घटना से जुड़ा है। महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान एसीपी ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया और उसे धक्का दिया।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया, जिन्हें पत्रकार संगठनों ने प्रदर्शन कवर करने वाली महिला पत्रकारों के खिलाफ कथित यौन हिंसा के आरोपों की जांच की मांग करते हुए दायर किया।

    ACP विवेक भगत की शिकायत पर महिला पत्रकार और उसके कुछ सहयोगियों पर ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारी को कथित रूप से सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और जातिसूचक टिप्पणियां करने के आरोप लगाए गए।

    इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 221, लोक सेवक के काम में बाधा डालने; धारा 356(2), मानहानि; और धारा 3(5), संयुक्त दायित्व से संबंधित प्रावधानों के साथ-साथ SC/ST Act की धाराएं लगाई गई।

    सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने प्रदर्शन कवर करने वाली महिला पत्रकारों के खिलाफ यौन हिंसा के आरोपों की जांच के लिए अलग समिति गठित करने का अनुरोध किया।

    उन्होंने सुझाव दिया कि समिति में सुप्रीम कोर्ट की रिटायर महिला जज और एक रिटायर आईपीएस अधिकारी को शामिल किया जाए।

    चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट प्रथम दृष्टया महिला जजों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य उपयुक्त लोगों की समिति गठित करने के पक्ष में है।

    उन्होंने जयसिंह से कहा कि वे दिन समाप्त होने तक उन महिलाओं के नाम उपलब्ध कराएं, जो सामने आकर अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में शिकायत दर्ज कराने को तैयार हैं।

    जयसिंह ने यह भी आरोप लगाया कि एक महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ हुई, लेकिन उसकी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं की गई। इसके बजाय, संबंधित पुलिस अधिकारी ने उस महिला पर जातिसूचक टिप्पणियां करने का आरोप लगा दिया।

    इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act के तहत आरोपी बनाई गई महिला पत्रकार को अंतरिम संरक्षण दिया।

    वाद 3 अक्टूबर की एक घटना से जुड़ा है। आरोप है कि महिला पत्रकार प्रदर्शन के दौरान एक कार्यकर्ता को हिरासत में लिए जाने की घटना रिकॉर्ड कर रही थी। इसी दौरान उसने आरोप लगाया कि ACP भगत ने उसे अनुचित तरीके से छुआ और धक्का दिया। खबर लिखे जाने तक उसकी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं की गई।

    चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट पत्रकारों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय करने पर भी विचार करना चाहता है। उन्होंने कहा कि पीठ प्रथम दृष्टया इस बात से सहमत है कि प्रस्तावित समिति में महिला जजों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को शामिल किया जाना चाहिए और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश बनाए जाने चाहिए।

    हालांकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने महिला पत्रकारों के साथ व्यवहार को लेकर व्यापक और बिना किसी भेद के लागू होने वाले निर्देश जारी करने का विरोध किया।

    उन्होंने कहा कि आरोपों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, लेकिन मौजूदा तकनीकी दौर में मोबाइल से वीडियो बनाने और उसे अपलोड करने वाले कई लोग स्वयं को पत्रकार बताते हैं।

    उन्होंने कहा कि किसी भी महिला के साथ अनुचित व्यवहार नहीं होना चाहिए लेकिन इस विषय पर व्यापक निर्देश जारी करने से पहले सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।

    इसके जवाब में जयसिंह ने दलील दी कि अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने वाली महिला पत्रकार एक ऐसा वर्ग हैं, जिन्हें विशेष रूप से यौन उत्पीड़न से सुरक्षा की जरूरत है, खासकर तब जब आरोप पुरुष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हों। उन्होंने यह भी कहा कि महिला पुलिसकर्मियों द्वारा पत्रकारों को धक्का दिए जाने की घटनाएं भी सामने आई।

    इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला पत्रकार की उस याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया, जिसमें एसीपी भगत की शिकायत पर दर्ज मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण मांगा गया।

    सुप्रीम कोर्ट में अब महिला पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों, कथित यौन हिंसा के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने और पत्रकारों के संरक्षण के लिए दिशानिर्देश तय करने पर आगे विचार किया जाएगा।

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