सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन हिंसा जांच समिति में बदलाव से किया इनकार, कहा- पक्षपात की धारणा से नहीं शुरू हो सकती जांच
Amir Ahmad
10 Sept 2026 5:51 PM IST

छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए गठित सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर्ड एनक्वायरी कमेटी में बदलाव की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फिलहाल सहमति नहीं जताई। याचिकाकर्ताओं ने समिति में पूर्व डीजीपी की मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि उनका एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी से करीबी संबंध है, जो जांच के दायरे में आ सकता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति को शुरुआत से ही पक्षपाती मानकर नहीं चला जा सकता। हालांकि, बेंच ने संबंधित सदस्य को लेकर उठाई गई विशिष्ट आपत्तियों पर विचार करने की बात कही।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि समिति सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी और फिलहाल इसका पुनर्गठन नहीं किया जाएगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि समिति को काम करने दिया जाए और यदि आगे किसी स्तर पर लगे कि समिति ने कुछ गलत किया है तो मामले को फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्ट इस मुद्दे से पीछे नहीं हट रहा है और जरूरत पड़ने पर मामले की खुली सुनवाई की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त के आदेश से पांच सदस्यीय समिति का गठन किया। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जस्टिस शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं। समिति को जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र जांच करनी है।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने बाद में समिति के पुनर्गठन की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया। उनका कहना था कि समिति की अध्यक्षता किसी पूर्व चीफ जस्टिस को दी जानी चाहिए और उसमें एक महिला सदस्य को भी शामिल किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान एडवोकेट प्रशांत भूषण ने समिति के पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व डीजीपी सदस्य को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि संबंधित सदस्य उस वरिष्ठ अधिकारी के करीबी मित्र और बैचमेट हैं, जिसके जांच के दायरे में आने की संभावना है। भूषण ने उनके खिलाफ ईमानदारी और निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठाए।
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया, जबकि सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बाकी सदस्यों को लेकर ऐसी कोई आशंका नहीं है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि संबंधित पूर्व डीजीपी को समिति में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि वह पूर्वोत्तर राज्य के डीजीपी रह चुके हैं और मुख्य भूभाग में राजनीतिक दलों के करीबी होने की संभावना कम है। उन्होंने यह भी कहा कि समिति का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस कर रहे हैं और पूर्व डीजीपी समिति के सबसे कनिष्ठ सदस्य हैं, इसलिए उनकी भूमिका भी सीमित है।
जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनी गई और उसके पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता वाली समिति के खिलाफ शुरुआत से ही पक्षपात की धारणा नहीं बनाई जा सकती। हालांकि, उन्होंने कहा कि एक सदस्य को लेकर याचिकाकर्ताओं की जो विशिष्ट शिकायत है, कोर्ट उस पर गौर करेगा।
गोपाल शंकरनारायणन ने जवाब में कहा कि मुद्दा समिति को पक्षपाती मानने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि समिति लोगों का भरोसा कायम कर सके। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में जांच के दौरान कमान की पूरी श्रृंखला की पड़ताल की बात कही गई है। यदि यह श्रृंखला गृह मंत्रालय तक जाती है तो सवाल उठता है कि समिति के सबसे कनिष्ठ सदस्य उस स्थिति में कितनी स्वतंत्रता से काम कर पाएंगे।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समिति के खिलाफ उठाई गई आपत्तियों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है और कोर्ट को ऐसी दलीलों को नजरअंदाज करना चाहिए। इस पर शंकरनारायणन ने कहा कि आरोपी समिति में अपनी बात तय नहीं कर सकते। सॉलिसिटर जनरल ने इस टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस स्तर तक नहीं गिर सकते और गरिमापूर्ण मौन ही उनका जवाब होगा।
केंद्र की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि हाई पावर्ड एनक्वायरी कमेटी को आवश्यक सभी व्यवस्थागत और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध करा दी गई तथा समिति की पहली बैठक 15 सितंबर को होने वाली है।
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी ओर से पक्ष रखने के लिए अपने वकील को एमिकस के रूप में नियुक्त कर सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि समिति को अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए अलग आदेश जारी किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान छात्र प्रदर्शनों में पैलेट गन के इस्तेमाल और पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा दिए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कहा कि केंद्र की ओर से अभी तक मामले में जवाब दाखिल नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल ने इस मुद्दे पर गौर करने का आश्वासन दिया, लेकिन अभी तक किसी अधिकारी ने पीड़ितों से संपर्क नहीं किया।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह मुद्दा समिति के सामने उठाया जा सकता है, जिस पर ग्रोवर ने कहा कि पैलेट गन के इस्तेमाल का सवाल संवैधानिक प्रकृति का है और इस पर फैसला सुप्रीम कोर्ट को ही करना चाहिए।
सीनियर एडवोकेट डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने प्रदर्शन स्थलों पर चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल के खिलाफ दाखिल याचिका का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस मामले में भी केंद्र की ओर से अब तक जवाब दाखिल नहीं किया गया।
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