सरकारी कानूनी पैनलों में महिला वकीलों को 30 प्रतिशत आरक्षण की मांग: सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और राज्यों को नोटिस
Amir Ahmad
20 May 2026 3:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कानूनी पैनलों में महिला वकीलों के लिए कम-से-कम 30 प्रतिशत आरक्षण की मांग करने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह आदेश पारित किया। अदालत सीनियर एडवोकेट विकास सिंह की दलीलें सुन रही थी, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए।
यह जनहित याचिका लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट ने दायर की। याचिका में मांग की गई कि सभी हाइकोर्ट पैनलों, सरकारी विधि अधिकारियों के पदों तथा केंद्र और राज्य सरकारों एवं सार्वजनिक उपक्रमों के कानूनी पैनलों में महिला वकीलों को न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।
सुनवाई के दौरान विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा हाल में किए गए सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को पेशे में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई बार महिलाओं को पैनल में शामिल तो कर लिया जाता है लेकिन उन्हें मामले आवंटित नहीं किए जाते। इसलिए ऐसा तंत्र बनाया जाना चाहिए, जिससे उन्हें नियमित रूप से मुकदमे भी मिलें।
याचिका में कहा गया कि देशभर में लगभग 15.4 लाख अधिवक्ताओं में केवल करीब 2.84 लाख महिलाएं हैं, जो कुल कानूनी पेशे का लगभग 15.31 प्रतिशत हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून की पढ़ाई में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है लेकिन वरिष्ठ और प्रभावशाली पदों पर उनकी संख्या बेहद कम है।
याचिका में उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की कम भागीदारी का भी मुद्दा उठाया गया। इसमें कहा गया कि वर्ष 1989 में जस्टिस फातिमा बीवी की नियुक्ति के बाद से अब तक केवल 11 महिलाओं को ही सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया।
साथ ही यह भी कहा गया कि स्वतंत्रता के बाद अब तक किसी महिला वकील को अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल नियुक्त नहीं किया गया। यहां तक कि हाईकोर्ट्स में नियुक्त एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के पद पर भी कोई महिला नहीं है।
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट डॉ. मोनिका गुसैन ने पीठ को बताया कि हरियाणा में सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद के गठन के बाद से अब तक किसी महिला वकील की नियुक्ति नहीं हुई।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कई महिला वकील एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद पर नियुक्त हैं। जवाब में डॉ. गुसैन ने कहा कि महिलाओं को पद तो मिल जाते हैं और उन्हें मानदेय भी मिलता है लेकिन कई बार पूरे महीने उन्हें एक भी मामला नहीं दिया जाता।
चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की,
“जब अब तक महिला एडवोकेट जनरल ही नियुक्त नहीं हुईं, तो सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल की बात क्यों की जा रही है?”
इस पर डॉ. गुसैन ने कहा,
“वह पद एडवोकेट जनरल से एक कदम नीचे भी तो है।”
बाद में चीफ जस्टिस ने कहा कि वह सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल जैसे पदनामों के पक्ष में नहीं हैं। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या देश में कभी महिला एडवोकेट जनरल रही हैं। इस पर वरिष्ठ वकीलों ने बताया कि अब तक केवल एक या दो महिलाओं को ही ऐसा अवसर मिला है।
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से विस्तृत सामग्री पेश करने को कहा और मामले में नोटिस जारी किया।

