हटाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को सुविधाएं क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
Amir Ahmad
7 Sept 2026 12:11 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उन संवैधानिक पदाधिकारियों जिसमें जज भी शामिल हैं, उनको इस्तीफे के बाद मिलने वाली सुविधाओं और अन्य लाभों पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
याचिका में मांग की गई कि जो संवैधानिक पदाधिकारी हटाने की कार्रवाई से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देते हैं, उन्हें कोई विशेष सुविधा, भत्ता, आवास या अन्य लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मांग की कि यदि कोई संवैधानिक पदाधिकारी अपने खिलाफ हटाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देता है तो उसे इस्तीफे के बाद किसी भी तरह की सुविधा, भत्ता, लाभ या अन्य अधिकार का हकदार नहीं माना जाए। याचिका में ऐसी किसी भी व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई, जो कार्यकाल के बीच इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारी को केवल हटाने की कार्रवाई से बचने के कारण ये सुविधाएं देती हो।
याचिका में अंतरिम राहत की भी मांग की गई। इसके तहत केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई कि हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद या उसे शुरू होने से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले किसी संवैधानिक पदाधिकारी को याचिका लंबित रहने के दौरान कोई विशेष सुविधा या लाभ न दिया जाए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि उच्च संवैधानिक पद अपने साथ कार्यकाल पूरा करने की अलिखित संवैधानिक जिम्मेदारी लेकर आता है। किसी पदाधिकारी के लिए हटाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देना न तो संविधान की भावना के अनुरूप है और न ही वांछनीय। याचिका के अनुसार, इस तरह के इस्तीफे संविधान द्वारा उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों पर जताए गए भरोसे को कमजोर करते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जब संवैधानिक पदाधिकारियों ने हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा दिया। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसका एक कारण यह भी है कि इस्तीफा देने के बाद भी उन्हें कई ऐसी सुविधाएं और लाभ मिलते रहते हैं, जो कार्यकाल पूरा करने पर मिलते।
याचिका में गैर-संवैधानिक और संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच इस मामले में कथित असमानता को भी अनुच्छेद 14 के आधार पर चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि गैर-संवैधानिक पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में इस्तीफा देने की अनुमति नहीं होती, जब उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई चल रही हो और उससे हटाए जाने की संभावना हो।
याचिका में तर्क दिया गया कि संवैधानिक पदाधिकारियों से सार्वजनिक जीवन में अधिक शुचिता और जवाबदेही की अपेक्षा होनी चाहिए। उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करना चाहिए और यदि उनके खिलाफ हटाने की कार्रवाई जरूरी हो तो उन्हें पारदर्शी प्रक्रिया का सामना करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने कहा कि गैर-संवैधानिक कर्मचारियों और संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच ऐसी स्थिति में किया गया भेदभाव अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद केंद्र सरकार का जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।


