क्या SIR नियमों से हटकर हो सकता है? प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग से सवाल
Amir Ahmad
22 Jan 2026 4:44 PM IST

विभिन्न राज्यों में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अहम सवाल उठाए हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग को असीमित और बिना नियंत्रण की शक्तियां नहीं दी जा सकतीं।
कोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से आयोग उचित समझे का अर्थ यह नहीं है कि प्रक्रिया संविधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से बाहर हो।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष चुनाव आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी दलीलें रख रहे थे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मौजूदा नियमों से हटने का अधिकार है। विशेष रूप से उन्होंने मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 और उसमें दिए गए फॉर्म-6 का उल्लेख किया, जिसमें दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया तथा मान्य दस्तावेजों की सूची दी गई।
जस्टिस बागची ने कहा कि फॉर्म-6 में लगभग 6 दस्तावेजों का उल्लेख है, जबकि SIR के तहत 11 दस्तावेज मांगे जा रहे हैं।
उन्होंने पूछा कि क्या चुनाव आयोग दस्तावेजों की संख्या बढ़ा सकता है या फॉर्म-6 में मान्य जन्म स्थान और निवास से जुड़े दस्तावेजों को नजरअंदाज कर सकता है।
इसके जवाब में सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(2)(a) का हवाला देते हुए कहा कि विशेष परिस्थितियों में चुनाव आयोग लिखित कारण दर्ज कर नियमों से अलग तरीके से भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है। उनका कहना था कि कुछ हालात में आयोग को नियमों से हटने की छूट है।
हालांकि, जस्टिस बागची ने दोहराया कि निर्धारित तरीके” का मतलब नियमों के अनुसार ही प्रक्रिया अपनाना होता है।
इस पर द्विवेदी ने दलील दी कि धारा 21(3) उपधारा (2) के बावजूद शब्दों से शुरू होती है, जिससे यह स्पष्ट है कि SIR के लिए यह एक स्वतंत्र और अलग शक्ति है।
धारा 21(3) के अनुसार चुनाव आयोग किसी भी समय कारण दर्ज करते हुए किसी निर्वाचन क्षेत्र में विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है, जिस तरीके से वह उचित समझे।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि चाहे चुनाव आयोग की व्याख्या मान भी ली जाए, फिर भी जब SIR से नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं तो प्रक्रिया कम से कम उतनी ही पारदर्शी क्यों न हो, जितनी सामान्य पुनरीक्षण में होती है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि मतदाता सूची में बदलाव के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा की जाती है कि अपनाई गई प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और न्यायसंगत हो।
इसके जवाब में राकेश द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का यह कहना नहीं है कि वह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), निष्पक्षता, पारदर्शिता और अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) के सिद्धांतों को नजरअंदाज कर सकता है। उन्होंने कहा कि SIR की प्रक्रिया को इन सभी संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरना होगा।
बाद में जस्टिस बागची ने फिर कहा कि कोई भी शक्ति पूरी तरह अनियंत्रित नहीं हो सकती। इस पर द्विवेदी ने सहमति जताई।
चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि भले ही धारा 21(3) में निर्धारित तरीके शब्द का उपयोग नहीं किया गया हो, लेकिन “जिस तरीके से उचित समझे” का अर्थ यह नहीं है कि प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ हो।
पीठ ने कहा कि SIR की “तरीका” भी संविधान, प्राकृतिक न्याय और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट आज दोपहर 2 बजे आगे की सुनवाई करेगा।

