अदालतों को अप्रबंधनीय सामान्य निर्देश जारी नहीं करने चाहिए: मॉब लिंचिंग पर 2018 के फैसले के खिलाफ अवमानना याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
Amir Ahmad
24 Feb 2026 12:54 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उस अवमानना याचिका पर विचार करने से इनकार किया, जिसमें राज्यों द्वारा 2018 के 'तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ' फैसले में जारी निर्देशों का पालन न करने का आरोप लगाया गया था।
उस फैसले में भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा और नफरती अपराधों को रोकने के लिए व्यापक निर्देश दिए गए।
चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच समस्त केरल जमीयत-उल-उलेमा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
चीफ जस्टिस ने याचिका पर विचार करने के प्रति अनिच्छा जताते हुए टिप्पणी की कि पहले जारी किए गए निर्देश सामान्य प्रकृति के थे और अवमानना याचिका तब दायर की जानी चाहिए जब किसी व्यक्ति के अधिकार प्रभावित हुए हों।
चीफ जस्टिस ने कहा,
"सबसे पहले, कोर्ट को ऐसे निर्देश जारी करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए जो अप्रबंधनीय हों। किसी भी मामले में यदि हम निर्देश जारी करते हैं तो वे सामान्य सिद्धांतों पर आधारित होते हैं, जिन्हें हम बताते हैं और उम्मीद करते हैं कि लोग उनके प्रति जागरूक होंगे।"
चीफ जस्टिस ने आगे स्पष्ट किया कि यदि विशिष्ट तथ्यों के आधार पर व्यक्तिगत शिकायतें होतीं तो अवमानना याचिका पर विचार किया जा सकता था।
बेंच ने अंततः याचिकाकर्ताओं को कानून में उपलब्ध अन्य कानूनी उपचारों का लाभ उठाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका खारिज की।
तहसीन पूनावाला मामले में शीर्ष अदालत ने संसद को मॉब लिंचिंग पर कानून बनाने की आवश्यकता पर विचार करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने इस अपराध को रोकने के लिए कई निवारक उपाय भी बताए, जिसमें राज्य सरकारों को मॉब लिंचिंग और नफरती भाषण फैलाने वालों की जानकारी जुटाने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का आदेश दिया गया।
उल्लेखनीय है कि शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ के एक संबंधित मामले में कोर्ट ने पहले भी 28 राज्य सरकारों से पूनावाला दिशानिर्देशों के अनुपालन पर रिपोर्ट मांगी थी ताकि नफरती भाषणों को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।

