कोविड में पति की मृत्यु के बाद कर्ज चुकाने में असमर्थ महिला को सुप्रीम कोर्ट से राहत, अनुच्छेद 142 के तहत बकाया राशि घटाई

Amir Ahmad

27 Jan 2026 3:56 PM IST

  • कोविड में पति की मृत्यु के बाद कर्ज चुकाने में असमर्थ महिला को सुप्रीम कोर्ट से राहत, अनुच्छेद 142 के तहत बकाया राशि घटाई

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए एक विधवा महिला के कर्ज की बकाया राशि घटा दी।

    कोर्ट ने यह आदेश COVID-19 महामारी के दौरान महिला के पति की मृत्यु के बाद उत्पन्न असाधारण और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों को देखते हुए पारित किया।

    हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश विशिष्ट परिस्थितियों में दिया गया और इसे भविष्य में मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले में संपूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए समानता के आधार पर अनुच्छेद 142 के अंतर्गत हस्तक्षेप आवश्यक है।

    मामले में महिला ने मद्रास हाइकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एकमुश्त समाधान योजना की समय-सीमा समाप्त हो जाने के बाद कर्ज चुकाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। महिला के पति ने 50 लाख रुपये का कर्ज लिया था, जिसके बदले एक आवासीय मकान गिरवी रखा गया था। पति कोविड महामारी के दौरान वर्ष 2021 में निधन हो गया। उनके जीवनकाल में कर्ज की किश्तें नियमित रूप से चुकाई जाती रहीं, लेकिन मृत्यु के बाद खाता गैर-निष्पादित संपत्ति घोषित कर दिया गया।

    इसके बाद बैंक ने गिरवी संपत्ति से वसूली की प्रक्रिया शुरू की, हालांकि महिला को एकमुश्त समाधान योजना के तहत 34 लाख 69 हजार रुपये में मामला निपटाने का प्रस्ताव दिया गया। महिला ने इसके तहत 3 लाख, 46 हजार, 900 रुपये की अग्रिम राशि जमा कर दी लेकिन शेष राशि छह महीने की अवधि में जमा नहीं कर सकी।

    महिला द्वारा पुनः एकमुश्त समाधान का अवसर देने का अनुरोध किए जाने पर बैंक ने अतिरिक्त 9 लाख रुपये की मांग की। इस राशि का भुगतान न कर पाने के कारण बैंक ने मकान पर कब्जे का नोटिस जारी कर दिया। इसके खिलाफ महिला ने मद्रास हाइकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया।

    हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका दायर किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। बाद में कोर्ट के निर्देश पर महिला को उसी पुरानी एकमुश्त समाधान योजना के तहत नया प्रस्ताव देने को कहा गया, जिसके आधार पर प्रारंभिक भुगतान किया गया।

    बातचीत के बाद कुल समझौता राशि 46 लाख, 34 हजार रुपये तय हुई, जिसमें पहले से जमा की गई अग्रिम राशि भी शामिल थी। महिला ने कोर्ट के समक्ष यह दलील दी कि बैंक की त्रुटि के कारण वह पहले की योजना का लाभ नहीं उठा सकी और समय-सीमा पार हो गई। उसने यह भी कहा कि सीमित संसाधनों के कारण उसकी देनदारी 31 लाख, 22 हजार रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने महिला द्वारा झेली गई गंभीर आर्थिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए कहा कि यद्यपि बैंक की मांग कानूनी रूप से टिकाऊ है लेकिन उसका पालन करना महिला के लिए अत्यधिक कठिनाई का कारण बनेगा।

    इन परिस्थितियों में कोर्ट ने 16 जनवरी को आदेश दिया कि महिला को पहले से जमा की गई अग्रिम राशि के अतिरिक्त 33 लाख रुपये का भुगतान करना होगा।

    कोर्ट ने कहा कि न्याय के उद्देश्य की पूर्ति इसी में है कि महिला को सीमित राहत दी जाए ताकि उसे अत्यधिक संकट का सामना न करना पड़े। सुप्रीम कोर्ट ने महिला को यह राशि जमा करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया।

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