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सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुनवाई को नोट करने की अर्ज़ी भी खारिज की

LiveLaw News Network
6 Aug 2019 11:05 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुनवाई को नोट करने की अर्ज़ी भी खारिज की
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याचिकाकर्ता यह भी कह रहे हैं कि मूल संविधान में भगवान राम के चित्र हैं इसलिए अयोध्या मामले की लाइव स्ट्रीमिंग "संवैधानिक देशभक्ति" को पूरा करेगी। ".. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संविधान की मूल प्रतियां ही भगवान राम के चित्रों का विस्तार करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस अर्जी को भी ठुकरा दिया है जिसमें यह कहा गया था कि रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग संभव ना हो तो इसका लिखित रिकॉर्ड रखा जा सकता है और हर सुनवाई के बाद उसे दिया जा सकता है।

अनुरोध किया गया खारिज

दरअसल याचिकाकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व विचारक के. एन. गोविंदाचार्य की ओर से CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ से यह अनुरोध किया गया कि 2 अधिकारी नियुक्त किए जाएं जो पूरी सुनवाई को नोट करें और हर सुनवाई के बाद इसे रिलीज किया जाए। लेकिन CJI गोगोई ने कहा कि ये अनुरोध खारिज किया जाता है।

इससे पहले सोमवार को याचिकाकर्ता की ओर से सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग की मांग की गई। यह कहा गया था कि फिलहाल सुनवाई की रिकॉर्डिंग कराई जा सकती है। लेकिन जस्टिस एस. ए. बोबड़े ने कहा था कि ये संस्थानिक फैसला है और इसके लिए CJI से बात करनी होगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व विचारक के. एन गोविंदाचार्य ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की दिन-प्रतिदिन की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस एफ. एम. आई. कलीफुल्ला की अध्यक्षता वाले पैनल ने गुरुवार को अयोध्या विवाद को सुलझाने में मध्यस्थता कार्यवाही की विफलता के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और इसके बाद 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने शुक्रवार को 6 अगस्त से दिन-प्रतिदिन की शुरुआत करने का फैसला किया है।

"लाइव स्ट्रीमिंग के साधन मौजूद"

वकील विराग गुप्ता के माध्यम से दायर की गई याचिका में शीर्ष अदालत के सितंबर 2018 के फैसले का उल्लेख किया गया है जिसमें यह कहा गया था कि अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग होनी चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील सोमवार को तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख कर सकते हैं। याचिका के अनुसार लगभग 1 साल बीतने के बावजूद अभी तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया जा सका है। याचिका में कहा गया है कि देश के पास अयोध्या मामले की लाइव स्ट्रीमिंग की व्यवस्था करने के साधन मौजूद हैं।

यह दावा किया गया है कि इस मामले की सुनवाई के लिए इस साल जनवरी में भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट को पहले ही एक पत्र लिखा गया था।

"कार्यवाही देखने की इच्छुक है जनता"

गोविंदाचार्य ने याचिका में कहा था, "यह मामला राष्ट्रीय महत्व का विषय है। करोड़ों लोग हैं .... जो इस अदालत के समक्ष अपनी कार्यवाही देखना चाहते हैं, लेकिन सर्वोच्च अदालत में वर्तमान मानदंडों के कारण ऐसा नहीं कर सकते।"

"लाइव स्ट्रीमिंग से होगी संवैधानिक देशभक्ति पूरी"

याचिकाकर्ता यह भी कह रहे हैं कि मूल संविधान में भगवान राम के चित्र हैं इसलिए अयोध्या मामले की लाइव स्ट्रीमिंग "संवैधानिक देशभक्ति" को पूरा करेगी। ".. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संविधान की मूल प्रतियां ही भगवान राम के चित्रों का विस्तार करती हैं। यह प्रस्तुत किया गया है कि इस न्यायालय के समक्ष कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग संवैधानिक देशभक्ति के जनादेश को भी पूरा करेगी।"

वर्ष 2010 के HC के फैसले के खिलाफ मामला SC में है

दरअसल SC में अपीलों का समूह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वर्ष 2010 के फैसले के खिलाफ है, जिसमें यह फैसला सुनाया गया था कि अयोध्या की 2.77 एकड़ भूमि को 3 भागों में विभाजित किया जाए, जिसमें 1/3 हिस्से में राम लला या शिशु राम के लिए हिंदू सभा द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना है, इस्लामिक सुन्नी वक्फ बोर्ड में 1/3 और शेष 1/3 हिस्सा हिंदू धार्मिक संप्रदाय निर्मोही अखाड़ा को दिया जाए।

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