प्रदर्शन स्थलों पर चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक निगरानी के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
Amir Ahmad
13 Aug 2026 12:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस द्वारा चेहरे की पहचान तकनीक और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों के इस्तेमाल के खिलाफ माकपा के राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका को कॉकरेच जनता पार्टी द्वारा हाल में आयोजित छात्र प्रदर्शनों से संबंधित लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि यह याचिका जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा डिजिटल तकनीकों के इस्तेमाल के संदर्भ में दाखिल की गई है।
उन्होंने अदालत को बताया कि निगरानी के लिए आदित्य इन्फोटेक लिमिटेड और डायमेंशन एनएक्सजी प्राइवेट लिमिटेड नाम की दो निजी कंपनियों की सेवाओं का इस्तेमाल किया गया। उनका आरोप है कि प्रदर्शनकारियों से संबंधित आंकड़े बिना अनुमति एकत्र किए गए तथा उनका प्रसंस्करण और भंडारण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के विपरीत किया गया।
सीनियर एडवोकेट ने अदालत के समक्ष कहा,
“एक आपके चेहरे का मानचित्र तैयार करता है और दूसरा एक वाहन है। चश्मे का इस्तेमाल किया जाता है और एक वाहन भी इस्तेमाल होता है। यह पूरा डेटा बिना अनुमति के लिया जाता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि इन निजी कंपनियों द्वारा डेटा को ऐसे तरीके से रखा जा रहा है, जो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के अनुरूप नहीं है। पीठ ने मामले पर विचार करने पर सहमति जताई।
याचिका में मुख्य आपत्ति यह उठाई गई कि दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किसी स्पष्ट कानूनी आधार के बिना किया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदर्शनों से संबंधित दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश और आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 किसी नागरिक सभा में मौजूद लोगों की बायोमेट्रिक निगरानी की अनुमति नहीं देते।
याचिका के अनुसार पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर CCTV कैमरे, ड्रोन, मोबाइल कमांड एवं नियंत्रण वाहन तथा अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया। इनके माध्यम से प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और वहां मौजूद अन्य लोगों की तस्वीरें और वीडियो एकत्र कर उनका प्रसंस्करण किया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों की इस तरह व्यापक बायोमेट्रिक पहचान किसी मौजूदा कानून के तहत अधिकृत नहीं है। याचिका में कहा गया कि पुलिस के स्थायी आदेशों या आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम में नागरिक सभा में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति की बिना भेदभाव बायोमेट्रिक पहचान करने की अनुमति नहीं दी गई।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसले पर भी भरोसा किया गया। इस फैसले में अदालत ने निजता के अधिकार में हस्तक्षेप करने वाली राज्य की कार्रवाई के लिए कानूनी आधार, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता जैसी आवश्यकताओं को महत्वपूर्ण माना था।
याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की बायोमेट्रिक निगरानी से उनके निजी डेटा को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा उसे किसके साथ साझा किया जाएगा और उसका किस प्रकार प्रसंस्करण होगा, जैसे गंभीर सवाल पैदा होते हैं। साथ ही इस डेटा को राष्ट्रीय आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े आंकड़ों के साथ जोड़े जाने की संभावित आशंका भी जताई गई।
याचिका में निगरानी में इस्तेमाल की गई तकनीकों, डेटाबेस और निजी कंपनियों के साथ किए गए समझौतों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग की गई। इसके अलावा प्रभावित व्यक्तियों को उनके संबंध में एकत्र किए गए डेटा तक पहुंचने और उसे हटाने का अनुरोध करने के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई।
याचिका में निजी कंपनियों को उनके पास मौजूद बायोमेट्रिक डेटा को सुरक्षित रखने, उसके इस्तेमाल पर रोक लगाने और अंततः उसे स्थायी रूप से हटाने का निर्देश देने की भी मांग की गई।


