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वकीलों की हड़ताल पर स्वत: संज्ञान केस : बीसीआई, राज्य बार काउंसिल से कोई प्रतिक्रिया नहीं, सुप्रीम कोर्ट का सहयोग के लिए बीसीआई अध्यक्ष से आग्रह

LiveLaw News Network
27 July 2021 4:56 AM GMT
वकीलों की हड़ताल पर स्वत: संज्ञान केस : बीसीआई, राज्य बार काउंसिल से कोई प्रतिक्रिया नहीं, सुप्रीम कोर्ट का सहयोग के लिए बीसीआई अध्यक्ष से आग्रह
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सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों द्वारा हड़ताल और काम से दूर रहने की समस्या के संबंध में, सोमवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष से कोर्ट को सहायता प्रदान करने का अनुरोध किया है।

कोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए कि न्यायालय के लगातार निर्णयों के बावजूद, अभी भी वकील/बार एसोसिएशन हड़ताल पर हैं, 28 फरवरी, 2020 को स्वत: संज्ञान लिया था और बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सभी राज्य बार काउंसिलों को आगे की कार्रवाई का सुझाव देने और वकीलों द्वारा हड़ताल/काम से दूर रहने की समस्या से निपटने के लिए ठोस सुझाव देने के लिए नोटिस जारी किये थे।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमआर शाह की बेंच ने सोमवार को कहा कि ऑफिस रिपोर्ट बताती है कि कोर्ट के फैसले के बावजूद, बार काउंसिल ऑफ इंडिया या स्टेट बार काउंसिल्स से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

बेंच ने सोमवार को कहा,

"इन परिस्थितियों में, हम निर्देश देते हैं कि इस न्यायालय के आदेश और निर्णय की एक प्रति बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष श्री मनन कुमार मिश्रा को प्रस्तुत की जाए। हम वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनन कुमार मिश्रा को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के रूप में इस कोर्ट को सहायता प्रदान करने का अनुरोध करते हैं।"

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति एम आर शाह की बेंच ने 28 फरवरी, 2020 के अपने फैसले से, उत्तराखंड राज्य के देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिलों में अदालतों का बहिष्कार करके हड़ताल करने वाले अधिवक्ताओं के प्रति गहरी नाराजगी जतायी थी।

SC ने यह भी कहा था कि 'पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत सरकार' जैसे मामलों में पूर्व में दिशानिर्देशों के बाववजूद वकीलों की हड़ताल हो रही है। इस पृष्ठभूमि में, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और स्टेट बार काउंसिल को आगे की कार्रवाई का सुझाव देने के लिए और वकीलों द्वारा हड़ताल/काम से दूर रहने की समस्या से निपटने का ठोस सुझाव देने के वास्ते स्वत: संज्ञान नोटिस जारी किए गए थे।

न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि अधिवक्ताओं द्वारा अदालतों का बहिष्कार अवैध था और इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के इस्तेमाल के नजरिये से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"हड़ताल पर जाने/अदालतों का बहिष्कार करने को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की आड़ में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। किसी को भी अदालतों में हड़ताल करने/इसका बहिष्कार करने का अधिकार नहीं है। यहां तक कि, यदि ऐसा कोई अधिकार है भी तो वह दूसरों के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकता है और विशेष रूप से, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटीकृत त्वरित न्याय के अधिकार को।"

कोर्ट पिछले साल 25 सितंबर को उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले के खिलाफ जिला बार एसोसिएशन, देहरादून द्वारा दायर अपील पर विचार कर रहा था, जिसमें इस तरह की हड़तालों को अवैध बताया गया था। हाईकोर्ट ने नोट किया था कि वकील पिछले 35 वर्षों से शनिवार को अदालतों का बहिष्कार कर रहे थे। हाईकोर्ट ने अदालत के दिनों में काम से दूर रहने के लिए वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया था।

एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि हड़ताल अन्य उपयुक्त मंच की अनुपस्थिति में वकीलों के समुदाय द्वारा अपनी शिकायत दर्ज करने का शांतिपूर्ण तरीका है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि हर महीने 3-4 शनिवार को अधिवक्ता किसी न किसी बहाने हड़ताल पर रहते हैं। हाईकोर्ट ने जिन आंकड़ों पर भरोसा किया है उनसे पता चला है कि देहरादून जिले में अधिवक्ता 455 दिनों (प्रति वर्ष औसतन 91 दिन) के लिए हड़ताल पर थे और हरिद्वार जिले में यह आंकड़ा 515 दिनों (प्रति वर्ष लगभग 103 दिनों) का है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'चौंकाने वाला' करार दिया था।

पीठ ने कहा,

"उपरोक्त निर्णयों में इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के बावजूद, इस न्यायालय ने बार-बार वकीलों को हड़ताल पर जाने से मना किया है, लेकिन हड़ताल अनवरत जारी रखा गया।"

इसने आगे कहा था :

"अगर वकीलों ने उन दिनों काम किया होता, तो यह बड़े हित में होता और यह त्वरित न्याय के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता, जिसे अब संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। इसने आपराधिक मुकदमों के शीघ्र निपटान में मदद की होती और इसलिए यह उन लोगों के हित में होता जो जेल में बंद हैं और अपने मुकदमे के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जब संस्थान लंबित मामलों की गंभीर समस्या और मुकदमों के निपटान में देरी की समस्याओं का सामना कर रहा तो न्यायपालिका एक महीने में चार दिन की हड़ताल को कैसे बर्दाश्त कर सकती है।"

बीसीआई और स्टेट बार काउंसिल को निर्देश

कोर्ट ने देखा था कि 'पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल', एक पंजीकृत सोसाइटी 'कॉमन कॉज' और 'कृष्णकांत नम्रकर' के मामलों में इस कोर्ट के फैसलों और अदालतों की बार-बार चेतावनियों के बावजूद, कुछ अदालतों में, वकील हड़ताल पर जाते हैं/या हड़ताल पर हैं।

बेंच ने कहा था,

"उपरोक्त निर्णयों में इस न्यायालय द्वारा इस्तेमाल किए गए कड़े शब्दों और वकीलों के हड़ताल पर जाने के आचरण की आलोचना करने के बावजूद, ऐसा प्रतीत होता है कि संदेश नहीं पहुंचा है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के दिनांक 29.09.2002 के संकल्प के बावजूद, न खुद बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा, न राज्यों की बार काउंसिल द्वारा कोई ठोस कदम उठाया गया। समय आ गया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्यों की बार काउंसिल इस मामले में दखल करें और ठोस कदम उठायें। यह सुनिश्चित करना बार काउंसिल का कर्तव्य है कि किसी भी वकील द्वारा कोई अव्यावसायिक और अशोभनीय आचरण न हो। जैसा कि इस न्यायालय ने 'पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल' मामले में कहा था कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अधिवक्ताओं के लिए पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों को निर्धारित करने का कर्तव्य सौंपा गया है। यह आगे कहा गया है कि इसका मतलब यह होगा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यह सुनिश्चित करती है कि अधिवक्ता अव्यावसायिक और अशोभनीय तरीके से व्यवहार न करें। अधिवक्ता अधिनियम की धारा 48 भारतीय बार काउंसिल को राज्य बार काउंसिलों को निर्देश देने का अधिकार देती है। आगे यह भी कहा गया है कि बार एसोसिएशन भले ही अलग-अलग निकाय हो सकते हैं, लेकिन सभी अधिवक्ता जो ऐसे संघों के सदस्य हैं, बार काउंसिल के अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र में हैं और इस प्रकार बार काउंसिल हमेशा उनके (वकीलों के) आचरण को नियंत्रित कर सकते हैं।"

इसलिए, इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए कि इस न्यायालय के पूर्वोक्त निर्णयों के बावजूद, अभी भी वकील / बार एसोसिएशन हड़ताल पर जाते हैं, कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और वकीलों द्वारा हड़ताल/कार्य से दूर रहने की समस्या से निपटने के लिए आगे की कार्रवाई करने तथा ठोस सुझाव देने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सभी राज्य बार काउंसिल को नोटिस जारी किये।

केस का शीर्षक : जिला बार एसोसिएशन, देहरादून बनाम ईश्वर शांडिल्य एवं अन्य

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