आज Gen Z , कल अल्फा-बीटा भी आएंगे: छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस वापस लेने का विरोध, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ा

Amir Ahmad

5 Aug 2026 1:24 PM IST

  • आज Gen Z , कल अल्फा-बीटा भी आएंगे: छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस वापस लेने का विरोध, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ा

    छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई।

    इस दौरान एक याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि यदि राजनीतिक समझौते के आधार पर ऐसे मामलों को वापस लेने की अनुमति दी गई तो यह भविष्य के आंदोलनों के लिए खतरनाक मिसाल बनेगी।

    उन्होंने कहा,

    "आज Gen Z है कल जेनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा भी आएंगे।"

    मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने की। पीठ ने इस याचिका को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया।

    इससे पहले 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ली जा सकती हैं।

    याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी ने प्रदर्शन आयोजित करने वालों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

    उनकी ओर से पेश एडवोकेट रिजवान अहमद ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान मंत्री और पुलिस की जवाबदेही की बात हुई लेकिन आयोजकों की जवाबदेही पर कोई चर्चा नहीं हो रही।

    उन्होंने कहा,

    "15 दिन बीत चुके हैं। आयोजक लगातार विभिन्न माध्यमों पर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और माहौल शांत करने की कोशिश नहीं कर रहे। उनकी जवाबदेही कौन तय करेगा?"

    एडवोकेट ने बिना नाम लिए उस समूह का भी उल्लेख किया, जिसने वर्ष 2026 की NEET परीक्षा प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया था।

    उनका कहना था कि कानून के अनुसार किसी भी सभा या प्रदर्शन के दौरान होने वाली अप्रिय घटनाओं के लिए आयोजकों की भी जिम्मेदारी होती है।

    उन्होंने अदालत से कहा कि यदि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों की मांग मानकर मामले वापस लेती है तो इससे गलत संदेश जाएगा और भविष्य में अन्य समूह भी इसी तरह दबाव बनाकर कार्रवाई रुकवाने की कोशिश करेंगे।

    राजस्थान में हाल की कानून-व्यवस्था की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रीय राजधानी में सरकार इस तरह झुकती है, तो अन्य राज्यों में भी यही मिसाल अपनाई जा सकती है।

    इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि शक्तिशाली राज्य की ओर से अत्यधिक सख्ती बरतने से स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने कहा कि मामलों को वापस लेने का निर्णय संभवतः इसी सोच के साथ लिया गया होगा।

    चीफ जस्टिस ने कहा,

    "ये युवा हैं। इन्हें उचित सलाह और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। राज्य की ओर से अनावश्यक आक्रामकता स्थिति को और हिंसक बना सकती है। इससे बचना जरूरी है।"

    याचिकाकर्ता के वकील ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य छात्रों को कठोर आपराधिक दंड दिलाना नहीं है।

    उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी नाबालिग ने अभद्र नारे लगाए हैं तो उससे निगरानी में सामुदायिक सेवा कराई जा सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पत्थरबाजी करने वालों को केवल इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि सरकार कठिन स्थिति में आ गई।

    उन्होंने आशंका जताई कि यदि ऐसे मामलों में ढील दी गई तो भविष्य में अन्य समूह भी संसद तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा कि संसद की सुरक्षा व्यवस्था इतनी बड़ी भीड़ से निपटने के लिए नहीं बनाई गई है और ऐसी स्थिति गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।

    इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस को भी अत्यधिक संयम बरतना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "हमें बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि युवा हिंसा की राह पर न जाएं। बेहतर तरीका यह है कि उन्हें समझाया जाए और भरोसा दिलाया जाए कि उनकी बात सुनी जा रही है।"

    अंत में पीठ ने इस याचिका को छात्र प्रदर्शनों से संबंधित अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया।

    याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि जुलाई 2026 के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों के खिलाफ कथित रूप से अभद्र, अपमानजनक या मानहानिकारक भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

    साथ ही, ऐसे लोगों से निगरानी में सार्वजनिक स्थानों या धार्मिक स्थलों पर स्वच्छता जैसे सामुदायिक कार्य कराने का भी निर्देश देने की मांग की गई।

    इसके अलावा याचिका में यह घोषणा करने का अनुरोध किया गया कि केंद्र या राज्य सरकारें केवल किसी राजनीतिक समझौते के आधार पर दंगा या हिंसा से जुड़े मामलों में अभियोजन वापस नहीं ले सकतीं।

    याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसा कोई भी निर्णय केवल कानून और निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाना चाहिए।

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