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हस्ताक्षर की गई कार्बन कॉपी जो मूल दस्तावेज़ की तरह उसी प्रक्रिया से बनाई गई है, साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
30 Oct 2019 7:03 AM GMT
हस्ताक्षर की गई कार्बन कॉपी जो मूल दस्तावेज़ की तरह उसी प्रक्रिया से बनाई गई है, साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हस्ताक्षर की गई कार्बन कॉपी जो मूल दस्तावेज़ की तरह उसी प्रक्रिया से बनाई गई है, उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 के अनुसार मूल दस्तावेज की तरह साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य किया जाएगा।

इस आधार पर न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले को पलट दिया, जिसमें हस्ताक्षरित कार्बन कॉपी को मूल दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया था।

इस मामले पर नए सिरे से विचार करने के लिए हाईकोर्ट को भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

"हाईकोर्ट की यह धारणा बिलकुल गलत है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 के प्रावधान के खिलाफ है। यह कार्बन कॉपी मूल दस्तावेज के रूप में उसी प्रक्रिया से तैयार की गई थी और एक बार दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद, इसे मूल दस्तावेज़ की तरह मान लिया जाना चाहिए।"

साक्ष्य का सामान्य नियम यह है कि दस्तावेज को स्वयं को साबित करने के लिए परीक्षण में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। धारा 62 के अनुसार, प्राथमिक साक्ष्य का मतलब है कि न्यायालय के निरीक्षण के लिए दस्तावेज खुद प्रस्तुत है।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 में दिए गए स्पष्टीकरण 2 में कहा गया है:

"जहां सभी दस्तावेजों को एक समान प्रक्रिया द्वारा बनाया गया है, जैसे कि मुद्रण, लिथोग्राफी, या फोटोग्राफी के मामले में, प्रत्येक अन्य शेष की सामग्री का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन, जहां वे सभी एक ही मूल दस्तावेज़ की प्रतियां हैं, वे मूल दस्तावेज़ की सामग्री का प्राथमिक प्रमाण नहीं हैं। "

इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 62 के स्पष्टीकरण 2 पर भरोसा किया। चूंकि कार्बन कॉपी मूल दस्तावेज के रूप में एक ही प्रक्रिया में तैयार की गई थी और पार्टियों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे, इसलिए अदालत ने माना कि इसे प्राथमिक सबूत के रूप में माना जा सकता है।

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