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गंभीर एवं समाज के खिलाफ अपराध में पीड़ित और आरोपी के बीच समझौता प्राथमिकी/आरोप-पत्र निरस्त करने का वैध आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
11 Feb 2020 6:51 AM GMT
गंभीर एवं समाज के खिलाफ अपराध में पीड़ित और आरोपी के बीच समझौता प्राथमिकी/आरोप-पत्र निरस्त करने का वैध आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि जब कथित अपराध समाज के खिलाफ हो तथा जो निजी प्रकृति के न हो वैसे मामलों में आरोपी और पीड़ित के बीच किया गया समझौता प्राथमिकी निरस्त करने का वैध आधार नहीं हो सकता।

इस मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहित की धारा 493 तथा दहेज निषेध कानून की धारा 3 और 4 के तहत आरोप दर्ज किये गये थे।

न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने कहा कि यद्यपि अपराध नन-कंपाउंडेबल हैं फिर भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत ऐसे अपराधों में मुकदमों को निरस्त करने की उच्च न्यायालय की शक्तियां शीर्ष अदालत के विभिन्न फैसलों के आलोक में सुस्पष्ट है और इस मुद्दे का निर्धारण अब बाकी नहीं रहा है।

कोर्ट ने 'पर्वत भाई अहीर एवं अन्य बनाम गुजरात सरकार' तथा 'ज्ञान सिंह बनाम पंजाब सरकार' मामलों में दिए गए फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा,

ऐसे मामलों में जो सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए हमारा मानना है कि अपील करता को जिस अपराध के लिए आरोपित किया गया है वह वास्तव में समाज के खिलाफ अपराध है और यह निजी प्रकृति का नहीं है।

ऐसे अपराधों का समाज के ऊपर गंभीर प्रभाव पड़ता है और ऐसे मामलों में मुकदमा जारी रखना जनहित की दृष्टि से सर्वोपरि है ताकि ऐसे गंभीर अपराधों के लिए आरोपी को दंडित किया जा सके।

यह न तो वाणिज्य, वित्तीय, व्यापारिक, साझेदारी या इस तरह के लेनदेन से उत्पन्न अपराध है, ना इसमें सिविल विवाद का कोई तत्व मौजूद है, इस प्रकार यह एक अलग तरह का अपराध है। ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच भले ही समझौता हो जाए, लेकिन यह प्राथमिकी या आरोपपत्र निरस्त करने का कोई वैध आधार नहीं हो सकता।

इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों पक्षों के बीच समझौते के आधार पर आरोप पत्र निरस्त करने से मना करके हाईकोर्ट ने गैर-न्यायोचित निर्णय दिया है।

धारा 493 आईपीसी की व्याख्या इस प्रकार की गई

आईपीसी की धारा 493 का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा कि इस अपराध का सार एक पुरुष द्वारा एक महिला को धोखा देना है, जिसके परिणाम स्वरूप महिला यह सोचती है कि वह संबंधित व्यक्ति से कानूनी तरीके से शादीशुदा है, जबकि ऐसा होता नहीं है और वह पुरुष के साथ सहवास करती है।

इसकी आगे व्याख्या करते हुए बेंच ने कहा:

" छल को एक व्यक्ति द्वारा जानबूझकर गलत इरादे से तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर झूठ का पुलिंदा बनाकर पेश करने जैसा कहा जा सकता है, जिसका इरादा उस व्यक्ति पर इस्तेमाल करना है जो इस पर भरोसा करके नुकसान उठाता है।

यह धोखा देने का एक प्रयास है जिसमें वैसी घोषणा या बयान शामिल होते हैं जो दूसरे को गलत और झूठी बात मानने के लिए गुमराह करते हैं।"

दूसरे शब्दों में आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध तय करने के लिए प्राथमिकी में लगाए गए आरोप से यह प्रदर्शित होना चाहिए था कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता की बेटी के साथ धोखा धोखा किया है, जिसके कारण उस लड़की को यह विश्वास हुआ कि उसकी कानूनन शादी हो चुकी है, जिसके बाद वह उस पुरुष के साथ सहवास करने को तैयार हो गई।

प्राथमिकी को ध्यान से पढ़ते हुए पीठ ने कहा कि इसमें लगाये गये आरोप आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध कहा जा सकता है।

बेंच ने कहा :

पीड़िता को छल करके या धोखा देकर यह मनवाने का कोई आरोप नहीं है कि पीड़िता अपीलकर्ता से कानून विवाहित है, जिसके प्रभाव में आकर पीड़िता ने आरोपी अपीलकर्ता संख्या एक के साथ यौन संबंध बनाये थे।

प्राथमिकी में केवल इस बात के आरोप हैं कि "शादी तय हो जाने के बाद, अपीलकर्ता नं.-1 शिकायकर्ता के घर गाहे-बगाहे जाना शुरू किया था। उसने शिकायकर्ता की बेटी को गुमराह किया कि उसका रिश्ता हो चुका है और केवल फेरे होने बाकी हैं। 16 अगस्त 2013 के दुर्भाग्यपूर्ण दिन अपीलकर्ता नं-1 ने अनुमति लेकर उसकी बेटी को बहलाया-फुसलाया और उसे अपने कमरे पर ले गया। उसने यह वादा करते हुए कि पीड़िता उसकी पत्नी है, आरोपी अपीलकर्ता नं1 ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाये।"

बयानों को ध्यानपूर्वक पढ़ने से यह प्रतीत होगा कि उन बयानों में आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध सुनिश्चित करने के तत्व मौजूद नहीं हैं। यहां तक कि आरोपों में प्रथमदृष्ट्या पीड़िता को यह बहलाने-फुसलाने का भी कोई तत्व मौजूद नहीं है कि वह अपीलकर्ता नं.1 से कानूनन विवाहित है और इस झूठे बयान के आधार पर पीड़िता ने आरोपी के साथ सहवास किया।

चूंकि प्राथमिकी में लगाये गये आरोपों से आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध सुनिश्चित करने के आवश्यक तत्व गायब हैं, इसलिए इस धारा के तहत अपीलकर्ताओं के खिलाफ अपराध सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी के आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी की ओर से शिकायतकर्ताओं से पांच लाख रुपये दहेज के मांगे गये थे और इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि दहेज प्रथा निवारण कानून के तहत अपराध नहीं किये गये। अपील को आंशिक तौर पर स्वीकार करते हुए बेंच ने कहा :

उपरोक्त तथ्यों एवं चर्चाओं के मद्देनजर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जहां तक आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध का मामला है तो प्राथमिकी के अनुसार इसके तहत कोई अपराध नहीं बनता। इसलिए उक्त धारा के तहत आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन होगा और इस प्रकार हाईकोर्ट का आदेश उस लिहाज से निरस्त करने योग्य है। हालांकि, जहां तक दहेज निवारण कानून की धारा 3 और 4 के तहत अपराध की बात है तो प्राथममिकी में इसे लेकर संज्ञेय अपराध का जिक्र किया गया है, इसलिए यह सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकारों के इस्तेमाल और इस अपराध के लिए अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा समाप्त करने का उचित मामला नहीं बनता।

केस का नाम : अरुण सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

केस नं. क्रिमिनल अपील 250/2020

कोरम : न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी

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