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शिकायत दर्ज करवाने में देरी के एकमात्र आधार पर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, केरल हाईकोर्ट ने आईपीसी 420 के तहत मामले पर सुनाया फैसला

LiveLaw News Network
28 Oct 2019 8:31 AM GMT
शिकायत दर्ज करवाने में देरी के एकमात्र आधार पर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, केरल हाईकोर्ट ने आईपीसी 420 के तहत मामले पर सुनाया फैसला
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जब शिकायत दर्ज करने के लिए कानून में कोई सीमा निर्धारित नहीं होती है, तो देरी के एकमात्र आधार पर इस कानून के अंतर्गत कोई मामला रद्द नहीं किया जा सकता। केरल हाईकोर्ट ने आईपीसी 420 के एक मामले में फैसला सुनाते हुए यह कहा।

इस मामले [सिंधु एस पानिकर बनाम ए .बालाकृष्णन ], में शिकायतकर्ता द्वारा कथित लेनदेन 10.04.2007 को हुआ था। आरोपी द्वारा शिकायतकर्ता को कथित रूप से दिया गया चेक दिनांक 16.05.2007 का था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत शिकायत 29.03.2011 को दर्ज की गई थी।

अभियुक्त द्वारा धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर एक याचिका में न्यायमूर्ति आर नारायण पिशराडी ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या इस शिकायत को अनुचित देरी के आधार पर रद्द कर दिया गया है? भले ही अधिनियम के तहत निर्धारित सीमा के संबंध में रोक नहीं है।

अदालत ने कहा,

"आपराधिक न्याय का सामान्य नियम यह है कि "एक अपराध कभी नहीं मरता है"। कानून की अदालत का दरवाजा खटखटाने में देरी के कारण खुद मामले को खारिज करने का कोई आधार नहीं होगा, हालांकि यह अंतिम फैसले तक पहुंचने में एक प्रासंगिक परिस्थिति हो सकती है (देखें जपानी साहू बनाम चंद्रशेखर मोहंती: AIR 2007 SC 2762)।
जब शिकायत दर्ज करने के लिए समय सीमा की कोई अवधि निर्धारित नहीं की जाती है, तो इस देरी के एकमात्र आधार पर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता। शिकायत दर्ज करने में देरी का सवाल अंतिम निर्णय पर पहुंचने में ध्यान में रखी जाने वाली परिस्थिति हो सकती है। लेकिन, अपने आप में यह शिकायत को खारिज करने के लिए कोई आधार नहीं देता है। अभियोजन को इस आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि शिकायत दर्ज करवाने देरी हुई।


अपराध के कृत्य के बारे में शिकायत दर्ज करने में अयोग्य और अस्पष्टीकृत देरी निश्चित रूप से मामले में अंतिम निर्णय लेने के लिए अदालत द्वारा ध्यान में रखा जाने वाला एक कारक होगा, लेकिन, जब शिकायत को समय सीमा से रोका नहीं जाता है, तो केवल अवांछित देरी के आधार पर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता। "

अदालत ने लक्ष्मण बनाम कर्नाटक राज्य के शीर्ष न्यायालय के हालिया फैसले का उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि रुपए वसूलने के लिए सिर्फ एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत करना आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

यह मामला विस्तार से पढ़ने के लिया यहां क्लिक करें

रुपए वसूलने के लिए सिर्फ एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत करना आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट

याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा,

" यह सही है कि शिकायतकर्ता ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कोई शिकायत दर्ज नहीं की है। यह धारा पहले आरोपी / पहले याचिकाकर्ता को नोटिस भेजने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन, पहले याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए उत्तर नोटिस भेजा था कि बैंक में उसका कोई खाता नहीं है, जिस पर चेक कथित रूप से लगाया गया था। यहां तक कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध के लिए मुकदमा चलाया गया है और उससे निपटाया गया है, तो भी उसे बाद में धारा 420 आईपीसी के तहत अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है। कारण यह है कि दोनों अपराधों के अवयव अलग-अलग हैं।"

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